अध्यात्म, अहंके हननका ही शास्त्र है !


एक श्रोताने वैयक्तिक विकास गुटमें सम्मिलित होने हेतु हमें सन्देश भेजा ।  जैसे ही उन्हें ज्ञात हुआ कि उस गुटमें उन्हें अपनी चूकें साझा करनी होगी तो उन्होंने झटसे प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए लिखा कि इससे तो मेरी निजताका हनन होगा ।
आप जब तक अपने दोषोंसे निर्मित हुए चूकोंको साझा नहीं करेंगे, आपको योग्य दृष्टिकोण कैसे मिल पायेगा और दोष निर्मूलनसे ही व्यक्तित्वका विकास होता है ।  यह वैदिक संस्कृतिवाली वैयक्तिक विकास है, यहां आपको बैठना कैसा है, ‘टेबल मैनर्स’ क्या है, हंसना कैसे है, टाई कैसे बांधने है, यह बातें नहीं बताई जानेवाली हैं और न ही आपको प्रवचन सुनाया जानेवाला है ।  यह उपक्रम आपको कर्म बंधनोंसे मुक्त करनेका शास्त्र बतानेवाला है एवं इस हेतु आपको योग्य कृति करनी होगी ।
जिस जिज्ञासुने यह प्रतिक्रिया दी, उन्हें तीव्र अनिष्ट शक्तियोंका कष्ट है, वे मुझसे दो-तीन बार इन्दौरमें मिल चुकी हैं, उनके तीव्र अहंकारके कारण भी उन्हें अनिष्ट शक्तियोंका तीव्र कष्ट है ।
ध्यान रहे, अध्यात्म ‘निजताके हनन’का ही शास्त्र है अर्थात् आप जितने प्रामाणिक होकर अपनी चूकोंको सभीके समक्ष रखते हैं, आपका अहं उतना ही शीघ्र न्यून होता है और विनम्र जीवात्मा जो अपने दोषोंको स्वीकार कर, उसमें अपेक्षित सुधार करे, उसकी अध्यात्ममें द्रुत गतिसे प्रगति होती है एवं ऐसोंको व्यष्टि स्तरके अनिष्ट शक्तियोंका भी कष्ट अल्प प्रमाणमें होता है ।
आज सामान्य व्यक्तियोंको अनिष्ट शक्तिका कष्ट इसलिए भी अधिक है; क्योंकि उनमें अहंकारका प्रमाण अधिक है ।  अपनी दोषोंको छुपाकर रखना, अपनी छविको बचाए रखने हेतु  अपने अहंका पोषण करना, इसकारण आजका सर्व सामान्य व्यक्ति अत्यधिक दु;खी रहता है ।
सभी व्यक्तियोंमें छ: ही षड्रिपु होते हैं, सातवां षड्रिपु होता ही नहीं है ! इसीलिए आपकी चूकें भी अन्य लोगों समान ही होंगी, मात्र किसीमें किसीमें मिथ्या बोलनेका दोष अधिक होगा तो किसीमें अपशब्द बोलनेका, कोई क्रोधके संस्कारसे पीडित होगा, कोई आलस्यसे, इसमें छुपानेवाली बात क्या है ! अपनी चूकोंको समष्टिमें स्वीकार कर, उसे हेतु योग्य मार्गदर्शन लेकर, अपना उद्धार करनेमें बडप्पन है, अपनी दोषोंसे उत्पन्न चूकोंको छुपानेमें नहीं ! और समष्टिमें रहनेसे एक-दूसरेसे सीखनेकी संधि मिलती है, आत्मीयता निर्माण होती है एवं योग्य उपाय योजना समझमें आती हैं ।
जहां सन्त जिनका अहम् न्यून या नगण्य समान होता है वे समष्टि स्तरके बलाढ्य आसुरी  शक्तियोंका आक्रमण सहते हुए आनंदपूर्वक कर्मरत रहते हुए सभीके कष्ट न्यून करने हेतु उपाय बताते हैं, वहीं आजका सामान्य व्यक्ति या साधक अनिष्ट शक्तियोंके कारण होनेवाले अपने कष्टोंपर ही मात नहीं पा सकता है एवं दुखी और अवसादग्रस्त रहते हैं ।  – तनुजा ठाकुर (३०.९.२०१७)
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