क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – १५)


अपने चंचल मनको नियन्त्रित करने हेतु करें अखण्ड नामजप  
मनका मुख्य कार्य विचार करना है, वस्तुत: मनकी परिभाषा ही है कि वह विचारोंका एक पुंज है; अतः उसका अपनी प्रकृति अनुरूप वर्तन करना स्वाभाविक है । मनको हम विषयके किसी भी भोगमें अधिक समयतक स्थिर नहीं कर सकते हैं, मात्र साधना करनेपर जब बुद्धि सात्त्विक हो जाती है, जिसे विवेक कहते हैं तो उसी विवेकके बलपर हम मनको नियन्त्रित करनेका प्रयास कर सकते हैं और इस विवेकका उपयोग नामस्मरणकी अखण्डताको साध्य करने हेतु कर सकते हैं । सतत नामजप एवं इन्द्रिय निग्रह करते रहनेपर मन विषयोंके प्रति अनासक्त हो जाता है और नामजपमें अखण्डता बनाए रखनेसे मनके तीव्र संस्कारोंका (विचार केन्द्रोंका) लय आरम्भ हो जाता है और मन तभी स्थिर व शान्त होता है, अन्यथा वह श्री वशिष्ठदर्शनके निम्नलिखित श्लोकमें जिसप्रकार कहा गया है, वह उसीप्रकार अशान्त रहता है –
चेतश्चञ्चला वृत्या चिन्तानिचयचञ्चुरम् ।
धृतिं बन्धाति नैकत्र पञ्जरे केसरी यथा ।। – श्री वशिष्ठदर्शनं

अर्थात मन, जिसकी मुख्य विशेषता चिन्ता करना है, अपनी अस्थिर वृत्तिके कारण एक स्थानपर उसीप्रकार स्थिर नहीं रहता, जैसे बद्ध सिंह अपने पिंजरेमें अस्थिर रहता है ।
अतः चित्तमें अनेक जन्मोंसे अंकित संस्कारोंके निर्मूलन हेतु करें अखण्ड नामजप !



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