कलियुगमें दोष और अहंके संस्कार अधिक होनेके कारण सामान्य मनुष्योंकी वृत्ति बहिर्मुख होती है और ऐसी वृत्तिके लोगोंका विवेक जागृत नहीं होता; फलस्वरूप ध्यान योग, ज्ञान योग या कर्म योग इत्यादिकी साधना करना उनके लिए अत्यन्त कठिन होता है । सात्त्विक जीव, जिनका विवेक जागृत होता है, उनकी प्रवृत्ति अन्तर्मुखी होती है, वह सदैव ईश्वरप्राप्ति रुपी अपने लक्ष्यकी ओर केन्द्रित रहता है, जैसे ध्यान मार्गी साधकके लिए साधना प्रधान होनेसे वह मात्र प्रतिदिन कुछ मिनिट नहीं, अपितु अनेक वर्षोंं ध्यानकी साधनामें लीन रहता है, ऐसे अनेक ध्यानमार्गी ऋषियोंके विषयमें हमारे धर्मशास्त्रोंमें उल्लेख मिलता है । आजकी स्थिति इसके विपरीत है, फेसबुक, व्हाट्सएप, ट्विटर और यूट्यूबमें अनावश्यक तथ्योंपर या क्रिकेट मैच, चित्रपट, धारावाहिक देखने हेतु अनेकोंके पास समय होता है; किन्तु साधना करने हेतु समय नहीं होता, इसके मुख्य कारण हैं – वृत्तिका बहिर्मुख होना एवं रजोगुणी व तमोगुणी होना । जिनकी वृत्ति बहिर्मुख होती है, वे बाह्य वस्तुओंसे सुख ढूंढनेका प्रयास करते हैं । ऐसे लोगोंके लिए कोई ऐसा साधना मार्ग चाहिए, जिसमें उन्हें ईश्वरके लिए पृथक (अलगसे) समय निकालकर साधनाके लिए न देना पडे और ऐसे रज और तम गुणोंसे युक्त जीवके लिए हमारे धर्मशास्त्रोंमें कहा गया है –
कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः । कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसंगः परं व्रजेत् ।। – श्रीमद् भागवतम्
अर्थ : दोषोंके भण्डार कलियुगमें यही एक महान गुण है कि इस समय श्रीकृष्णका कीर्तनमात्र करनेसे मनुष्य बन्धनमुक्त हो परमपदको प्राप्त हो जाता है; अतः नामजप करें !
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