क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – २३)


कुछ समय पूर्व एक विवाहित स्त्री मुझसे मिली और उन्होंने कहा, “कुछ माह साधना करनेके पश्चात अब मुझे, मेरेद्वारा इसी जन्ममें किए गए पापोंका स्मरण होने लगा है, मैंने दो बार अनचाहे गर्भ ठहरनेपर उसका गर्भपात करवाया है,”  इसीप्रकार एक व्यक्तिने मुझसे कहा, “मैं एक ऐसे शासकीय(सरकारी) पदपर हूं जहां बहुत ही सरलतासे उत्कोचका (घूसका) पैसा प्राप्त होता है, मुझे अभी तक उसे लेना अनुचित नहीं लगता था, मुझे लगता था कि सभी भ्रष्टाचार कर रहे हैं तो यदि मैं भी कर रहा हूं तो यह अनुचित कैसे हो सकता है ?; किन्तु जबसे आपके लेख नियमित पढने लगा हूं, सत्संग सुनने लगा हूं और नामजप करने लगा हूं तो मुझे अब यह पापकर्म लगने लगा है; इसीलिए अब इसका क्षालन कैसे करूं ?, यह मैं सोचने लगा हूं । यह तो मैंने मात्र दो व्यक्तियोंके विषयमें बताए हैं । इसीप्रकार अनेक व्यक्तियोंने मुझसे कहा है कि धर्मके विषयमें जाननेपर मुझे अब अपने पापकर्मोंका स्मरण होने लगा है ।

  ध्यान रहे, किसी भी व्यक्तिद्वारा किए गए पापकर्मोंका परिणाम उसे इस जन्ममें या अगले जन्ममें भोगना ही पडता है;  अतः पहले ही ईश्वरीय विधान अनुसार आपको दण्ड मिले, इसलिए स्वयंद्वारा किए गए पापकर्मोंका भान होनेपर उसके क्षालन हेतु योग्य प्रायश्चित लें एवं साथ ही आर्ततासे नामजप करें । ईश्वर करुणाके सागर हैं, वे भक्तवत्सल हैं, वे आपको अवश्य क्षमा करेंगे, इस हेतु उनका भावपूर्वक नामजप करें । ऐसा भाव रखनेसे और नामजपके प्रभावसे आपके सर्व पापकर्म नष्ट हो जायेंगे क्योंकि –

यन्नामकीर्तनं भक्त्या विलापनमनुत्तमम् । मैत्रेयाशेषपापानां धातूमिव पावकः ।।

अर्थ : जैसे अग्नि सुवर्ण आदि धातुओंके मलको नष्ट कर देती है, ऐसे ही भक्तिसे किया गया भगवानका कीर्तन सब पापोंके नाशका अत्युत्तम साधन है । अतः नामजप करें !



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