जब कुछ लोगोंको नामजप करनेके लिए कहा जाता है तो वे कहते हैं कि पहले अपने सभी उत्तरदायित्वोंसे निवृत्त हो लें उसके पश्चात नामजप करेंगे । ऐसे सभी लोगोंको बता दें कि आप मायासे यदि निवृत्त होना भी चाहेंगें तो माया आपको कभी निवृत्त नहीं होने देगी । मायाका कार्य ही है जीवको आसक्तियोंमें बद्ध करना । आजके कालमें एक सामान्य गृहस्थ, अपने जीवनकालमें वानप्रस्थ और संन्यास आश्रममें प्रवेश नहीं कर पाता है; क्योंकि ब्रह्मचर्य कालमें साधनाका जो संस्कार व्यक्तिपर माता-पिता एवं शिक्षकों या आचार्योंद्वारा अंकित किया जाना चाहिए, वह नहीं किया जाता है; अतः आजका गृहस्थ २५ से ५० वर्ष अपने जीवनको सुखी बनानेमें और पुत्र-पुत्रियोंके लालन-पालनमें व्यतीत कर देता है और ५१ वर्षके पश्चात जब तक वह जीवित रहता है तब तक पुत्र और पुत्रियोंकी संतानोंकी आसक्तिमें या अपने अर्जित सुखके उपभोगमें या अपने बच्चोंके कष्टका रोना रोते हुए व्यतीत कर देता है ! अतः मायासे कभी मुक्ति सम्भव नहीं । यह मैं पिछले २१ वर्षोंसे भारत एवं विश्वके अनेक देशोंके घर-घरमें जाकर धर्मप्रसारके मध्य हुए अपने वैयक्तिक अनुभवके आधारपर कह रही हूं । अर्थात आजका गृहस्थ जिस परिस्थितिमें है यदि वह उसी स्थितिमें साधना आरम्भ न करे तो वह साधना कभी आरम्भ नहीं कर पाता है एवं सम्पूर्ण जीवन मायाके चक्रव्यूहमें फंसकर, इस अनमोल मनुष्य जीवनको व्यर्थ कर देता है ।
धर्मप्रसारके मध्य अनेक सन्तोंके आश्रमोंमें जानेका सौभाग्य प्राप्त हुआ है और मैंने पाया कि आज अनेक आश्रम, अच्छे साधकोंके अभावमें अस्वच्छ एवं अव्यवस्थित रहते हैं या यदि वे स्वच्छ व व्यवस्थित हों तो वहां साधना करनेवाले नहीं होते हैं । जिन सन्तोंके पास धन है, वे धन देकर कार्यकर्ताओंसे अपना कार्य करवाते हैं, अन्यथा उत्तर भारतके अधिकांश आश्रमोंकी स्थिति तो अत्यन्त दयनीय है । बात ही बातमें आश्रमके मुखिया या प्रधान बताते हैं कि आश्रममें देखभाल करनेवालोंकी अत्यधिक न्यूनता है । जब समाजमें साधकत्व नहीं रहेगा तो आश्रममें साधकोंकी न्यूनता तो होगी ही !
सामान्य व्यक्तिके द्वारा धर्म और साधना त्याग देनेके कारण उनके जीवनमें सूक्ष्म जगतकी आसुरी शक्तियोंका कष्ट बढ गया है और जब बुद्धिद्वारा सब प्रयास कर उसके जीवनके कष्ट दूर नहीं होते तो वह सन्तोंके चक्कर काटने लगता है और आज ९५ % व्यक्ति जो साधना करते हैं, वे अपने कष्टोंको दूर करने हेतु साधना करनेको या किसी सन्तसे जुडने हेतु बाध्य हुए हैं, अन्यथा कलियुगी जीव जिसके पास पूर्व जन्मकी पुण्याईके कारण सब सुख हैंं, वे तो ईश्वरके अस्तित्त्वको ही नहीं मानते हैं और जो अत्यन्त दुखी हैं वे अपने दुखोंके साथ समझौता कर वैसे ही जीवन व्यतीत करते हैं !
हमारी संस्कृतिमें चार आश्रमोंकी व्यवस्था (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास) मनुष्यके जीवनको सार्थकता देने हेतु बनायी गई थी; अतः एक व्यक्तिका प्रवास इन सभी आश्रम व्यवस्थाओंमें हो, इस हेतु बाल्यकालसे नामजप करना अनिवार्य है । ब्रह्मचर्य आश्रममें नामजपके संस्कार होनेपर गृहस्थ सुखी और धर्माचरणी होता है और उसकी मायासे स्वतः ही अनासक्ति बढती है एवं वह चाहे गृहस्थ जीवनमें हो तो भी उसके मनका प्रवास वानप्रस्थ और संन्यासकी ओर होता है; अतः हे गृहस्थों, स्वयं नामजप करें एवं अपने बच्चोंमें भी यह संस्कार अंकित करें ।
Leave a Reply