कलियुगके इस चरमकालमें देसी गायका घी, समिधा हेतु सभी सात्त्विक सामग्रीकी न्यूनता तथा योग्य प्रकारसे वैदिक मन्त्रोच्चारण न आनेके कारण, यज्ञ करना आज अनेक लोगोंके लिए कठिन होता जा रहा है । भगवान श्रीकृष्ण कलियुगकी स्थितिसे चिरपरिचित थे; अतः उन्होंने गीतामें स्पष्ट रूपमें कहा है –
महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् ।
यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः ।।
अर्थ : महर्षियोंमें भृगु और वाणियोंमें (शब्दोंमें) एक अक्षर अर्थात प्रणव “मैं” हूं । सम्पूर्ण यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय “मैं” हूं ।
अनादि कालसे यज्ञ करना और करवाना, यह तो हमारी वैदिक संस्कृतिका मूल आधार रहा है और हिन्दू राष्ट्रमें सर्व साधारण व्यक्तिको विद्यालयीन पाठ्यक्रमोंसे ही यज्ञसे सम्बन्धित सर्व जानकारी दी जाएगी, घर-घर देसी गाय होगी, दूध-गोघृत सरलतासे उपलब्ध होंगें, समिधा भी सात्त्विक मिलेगी और सर्वत्र उपलब्ध होगी; अतः सभी वैदिक हिन्दू सरलतासे दैनिक जीवनमें यज्ञ-होम-हवन कर पाएंगे; किन्तु जब तक यह सभीके लिए सम्भव नहीं, तबतक सभीने जपयज्ञ करनेका प्रयास करना चाहिए । जप करना सभी यज्ञोंमें श्रेष्ठ है, यह भगवानके श्रीमुखसे निकला हुआ वेद वचन है; इसीलिए ईश्वरका नामजपकर, वैदिक-हिन्दू बनें !
वैदिक आर्य कभी भी दुखी नहीं रहा है, उसके जीवनमें कलह-क्लेश हेतु स्थान नहीं था । अपंग बच्चे, सम्बन्ध विच्छेद, भिन्न प्रकारके मनोविकार कहीं दिखाई नहीं देते थे, सुख-समृद्धिसे परिपूर्ण वह आनन्दी जीवन व्यतीत करता था ! यदि आपको अपने जीवनको सुखी बनाना है तो जपयज्ञका आधार लें और सनातनी हिन्दू समान सुख और आनन्दसे रहनेकी अनुभूतिकी प्रतीति लें ।
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