क्यों करें अखंड नामस्मरण ? (भाग – ३)


भगवानके नामजपकी महिमा अनन्त है, यह सभीको तारनेकी शक्ति रखता है । नामजपके कारण साधक और संन्यासियोंकी तो आध्यात्मिक प्रगति होती ही है, साथ ही यह पापी जीवोंके संचितको भी नष्ट कर उसे सर्व पापकर्मोंसे मुक्त करती है एवं उसके मलिन मन व बुद्धिको शुद्ध करती है सात्त्विक बनाकर ईश्वर उन्मुख करती है । रत्नाकर दस्यु (डाकू) जैसे व्यक्ति जब नामजपसे ऋषि बन सकते हैं तो सामान्य जीवोंका उद्धार नामजप कैसे सम्भव नहीं हो सकता है ?, स्वयं सोचें ! मात्र नामजपको प्रेमसे और लगनसे करनेकी आवश्यकता है, इसे प्राथमिकता देनेकी आवश्यकता है । मायासे बद्ध जीवोंका भी यह कैसे उद्धार कर सकता है ?, इस सम्बन्धमें यह शास्त्र वचन अत्यन्त प्रेरणास्पद है –
आपन्न: संसृतिं घोरां यन्नाम विवशो गृणन् ।
तत: सद्यो विमुच्येत यद्विभेति स्वयं भयम्॥ – श्रीमद्भागवतम्
अर्थ : घोर संसार-बंधनमें पडा हुआ मनुष्य विवश होकर भी यदि भगवन्नामका उच्चारण करता है तो वह तत्काल उस बन्धनसे मुक्त हो जाता है और उस पदको प्राप्त होता है, जिससे भय स्वयं भय मानता है । – तनुजा ठाकुर



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