क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – २)


कलियुगमें मायाका प्रभाव अत्यधिक होता है, ऐसेमें सामान्य बद्ध जीवके लिए साधना हेतु समय निकालना कठिन होता है, ऐसेमें उठते-बैठते, चलते-फिरते, खाते-पीते भगवानके नामका सुमिरन करना सबसे सरल साधना मार्ग है । इससे जीवमें ईश्वरके प्रति प्रेम निर्माण होता है, उसमें थोडी अन्तर्मुखता आती है और वह साधनाको प्रधानता देने लगता है । इसी प्रयाससे वह अध्यात्ममें मार्गक्रमण करने लगता है और उसका उद्धार होता है । कलियुगमें सामान्य मनुष्यके लिए ध्यानयोग हेतु धैर्य नहीं होता, कर्मयोग हेतु निष्काम भाव नहीं होता (स्वार्थी होनेके कारण अपेक्षाएं अधिक होती हैं), ज्ञानयोग हेतु कुशाग्र सात्त्विक बुद्धि नहीं होती है (तमोगुणी आचार-विचारके कारण बुद्धि तामसिक होती है), ऐसेमें भक्तियोग अन्तर्गत नामसंकीर्तनयोग सबसे सरल साधना मार्ग है और हमारे अनेक धर्मग्रन्थ इसकी पुष्टि करते हैं, जैसे बृहन्नारदीयपुराणमें बताया गया है –

हरेर्नामहरेर्नामहरेर्नामैवकेवलम् ।

कलौनास्त्येवनास्त्येवगतिरन्यथा ॥

अर्थ : कलियुगमें हरि-नामके अतिरिक्त भव-बन्धनसे मुक्ति प्रदान करनेवाला दूसरा कोई और साधन नहीं है;

अतः भगवानके नामका स्मरण नित्य करते रहनेसे साधनामें अखण्डता साध्य हो जाती है और यही हमें जन्म-मृत्युके बन्धनसे मुक्तकर, आनन्दकी अनुभूति प्रदान करता है । जिस नामकी महिमाका वर्णन अनेक धर्मग्रन्थोंमें किया गया है, उसकी अनुभूति लेने हेतु नामजप करें एवं उसे अधिकसे अधिक बढाते हुए अखण्ड करनेका प्रयास करें !



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