क्यों करें अखण्ड नामस्मरण ? (भाग – ४)


साक्ङेत्यं पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा ।
पारिहास्यं वा स्तोभं हेलनमेव वा ।
वैकुण्ठनामग्रहणमशेषाघहरं विदु: ।।
पतित: स्खालितो भग्न: संदष्टस्तप्त आहत: ।
हरिरित्यवशेनाह पुमान्नर्हति यातनाम् ।।   
अर्थ : अर्थात संकेतमें, परिहासमें, तान अलापनेमें अथवा किसीकी अवहेलना करनेमें भी यदि कोई भगवानके नामोंका उच्चारण करता है तो उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं । जो मनुष्य गिरते समय. पैर फिसलते समय, अंग – भंग होते समय, सांपके डंसते समय, आगमें जलते तथा चोट लगते समय भी विवशतासे ‘हरी-हरी’ कहकर भगवानके नामका उच्चारण कर लेता है, वह यमयातनाका पात्र नहीं रह जाता ।
भावार्थ : ईश्वरका नाम प्रत्येक परिस्थितिमें कल्याणकारी है, वह ही मनुष्यके जीवनको  सार्थकता   प्रदान करता है । भक्तके ह्रदयमें जब भगवानके नामकी लगन लग जाती है तो वह अखण्ड होने लगता  है । जैसे जब किसी सामान्य व्यक्तिको चोट लगती है या कोई अपघात होता है तो उस क्षण उसके मुखसे अनायास ही ‘ओ मां, मर गया, अरे बाप रे, हाय कोई बचाओ’ इसप्रकारके वचन निकलते हैं;  किन्तु जिसने खरे अर्थोंमें नामस्मरणको अखण्ड जपते हुए, उसे अन्तर्मनमें बसा लिया हो, उसके मुखसे ही अप्रिय घटनाके घटते समय हरिका नाम निकलता है ।अर्थात सुखके क्षणमें नामस्मरण करनेके साथ ही जब दु:खके समय भी हरिका नाम सहज ही मुखसे निकलता है, तब ऐसे भक्तोंके लिए तो हरि अपना सुदर्शन छोड  भी सहायता हेतु भागे चले आते हैं, इतिहास इसका साक्षी है, सबसे महत्त्वपूर्ण तथ्य यह है कि सुख हो या दु:ख किसी भी परिस्थितिमें नामजपका आधार न छोडनेवाला ही खरे अर्थोंमें साधक कहलानेका अधिकारी होता है एवं वही ईश्वरीय कृपाका पात्र बनता है; अत: हे साधको, अखण्ड नामजप करें !


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