नवम्बर २१, २०१८
इलाहाबाद उच्च न्यायालयने अपने एक निर्णयमें कहा है कि यदि लडका और लडकी व्यस्क है और अपनी इच्छासे साथ रह रहे है तो किसीको आपत्ति करनेका अधिकार नहीं है, माता-पिताको भी नहीं ! न्यायाधीश ठाकेरने एक जोडेद्वारा प्रविष्ट इस याचिकापर यह बात कही ।उच्च न्यायालयने अपने निर्णयमें उच्चतमन्यायालयके निर्णयका भी वर्णन किया । न्यायालयने कहा कि उन्हें पूर्ण स्वतन्त्रता है और किसीको बोलनेका अधिकार नहीं है ।
यद्यपि न्यायालयने यह स्पष्ट किया कि वे उनके विवाहको सही नहीं बता रहे हैं और न ही विवाहका कोई प्रमाण-पत्र दे रहे हैं । न्यायालयने पुलिसको भी उन दोनोंको सुरक्षा देनेको कहा ।
उल्लेखनीय है कि इसी वर्ष शीर्ष न्यायालयके पास एक ऐसा प्रकरण आया था, जिसमें लडकेकी आयु २१ वर्षसे अल्प थी और लडकीके पिताने उच्च न्यायालयके निर्णयके पश्चात लडकीका संरक्षण अपने पास रखा था । इसपर युवकने याचिका प्रविष्ट की थी, लेकिन न्यायालयने हिन्दू विवाह अधिनियम -१९९५ अन्तर्गत विवाहको आयु न होनेसे अवैध बताया था और यह भी कहा था याचिकाकर्ता व्यस्क है तो विवाह बिना भी साथ रह सकते हैं !
“जैसे-जैसे संयुक्त परिवार और घरोंमें धर्मपालन व संस्कारोंका लोप हुआ, वैसे ही उच्छृंखलताने युवाओंकी बुद्धिको भ्रष्ट व कुमार्गगामी बना दिया और शेष कार्य विधर्मी लोकतन्त्र व मैकॉले शिक्षित नियम रचने वालोने किया ! दोसे तीन पीढीका बुद्धिविनाश होनेसे अब हिन्दू-राष्ट्र ही एकमात्र पर्याय है, जिसमें बालपनसे ही बच्चोंको धर्मकेसंस्कारोंका बीजारोपण किया जाएगा !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : जनसत्ता
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