उच्च न्यायालयने शमीम अहमदको पढाया पत्रकारिताका पाठ, उत्तर प्रदेश विधानसभाके सम्मुख सुरेन्द्रको आत्मदाहके लिए उकसानेका प्रकरण  


२ जुलाई, २०२१
        इलाहाबाद उच्च न्यायालयने कहा है कि पत्रकारसे यह आशा नहीं की जाती कि वह किसीका जीवन सङ्कटमें डालकर उस घटनाका नाटकीकरण करे तथा समाचारको भयावह दिखाए । उच्च न्यायालयने यह टिप्पणी ‘टीवी’ पत्रकार शमीम अहमदकी प्रतिभूति याचिकाको अस्वीकृत करते हुए की । शमीमपर गत वर्ष एक व्यक्तिको उत्तर प्रदेश विधानसभा भवनके सम्मुख आत्मदाह करनेके लिए उकसानेका आरोप है, जिससे वह इस घटनाको अपने ‘कैमरे’में ‘कैद’ कर सके ।
       न्यायाधीश श्रीवास्तवने २१ जूनको दिए गए अपने आदेशमें यह भी कहा कि उपलब्ध प्रमाण तथा प्रकरणमें प्रविष्ट किए गए  वक्तव्यसे प्रथम दृष्ट्या यही तथ्य सामने आता है कि आरोपी शमीम अहमदने मृतकको यह कहते हुए उकसाया कि यदि वह उत्तर प्रदेश विधानसभा भवनके सामने आत्महत्याका प्रयास करेगा तो उसकी बात शीघ्र सुनी जाएगी ।
         आत्मदाह करनेवाला सुरेन्द्र चक्रवर्ती लखनऊके उदयगंज क्षेत्रमें जावेद खानके यहां ‘किराए’से रहता था । जावेद अपना घर खाली कराना चाहता था; परन्तु सुरेन्द्रने आर्थिक तंगीकी बात कहकर घर खाली करनेमें असमर्थता प्रकट की । इसके पश्चात १९ अक्टूबर २०२० को घरके स्वामीने कथित ढंगसे उससे ‘गाली-गलौच’ की । इसी मध्य आरोपित पत्रकार शमीम अहमदने सुरेन्द्रको स्वयंको आग लगाने तथा घटनाको ‘कवर’ करनेका वचन दिया ।
       एक तो पत्रकार और दूसरा जिहादी पत्रकार, जब दोनों एक ही हो तो व्यक्तिसे ऐसी अपेक्षा अवश्यम्भावी ही है । पत्रकारिताका वर्तमान समयमें क्या स्तर है ? यह किसीसे छुपा नहीं है और पत्रकारिता जिहादी हो तो वह समाजका विष बन जाता है । ऐसी पत्रकारिताके कारण ही आज देशकी यह स्थिति है; क्योंकि धन लेकर ये वही दिखाते हैं, जो समाजको दिखाना और समझाना चाहते हैं अर्थात अनुचित तथ्य ! ऐसी निकृष्ट पत्रकारिता व पत्रकारोंका शीघ्र ही अन्त आवश्यक है ।  – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
 
 
स्रोत : ऑप इंडिया


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