अल्पायुसे ही साधना करना क्यों आवश्यक है ? (भाग – ५)


छोटी आयुसे साधना आरम्भ करनेपर चित्तमें नूतन संस्कार निर्माण नहीं होते :
हमारा मन अशांत क्यों रहता है ?; क्योंकि चित्तपर अनेक जन्मोंके असंख्य संस्कार होते हैं । जैसे-जैसे आयु बढती है, संस्कारोंके केन्द्र एवं अन्य संस्कार भी बढते जाते हैं । जैसे एक पांचवी कक्षाका विद्यार्थी जब नामजप करने बैठेगा, तब उसके मनमें अपने माता-पिता, भाई-बहन, खेल, मित्र और विद्यालयके विचार आएंगे; परन्तु एक ७० वर्षका वृद्ध, जिसने कभी साधना नहीं की, यदि वह नामजपके लिए बैठेगा तो पिछले सत्तर वर्षके सभी संस्मरण उसके नामजप करनेमें या मनको एकाग्र करनेमें विघ्न डालेंगे !



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