अल्पायुसे ही साधना करना क्यों आवश्यक है ? (भाग – ६)


अल्पायुसे ही साधना करनेसे पूर्व जन्मोंके संस्कारका नष्ट होना :
अल्पायुसे ही साधना आरम्भ करनेपर इस जन्मके नूतन संस्कार चित्तमें अंकित नहीं हो पाते हैं; क्योंकि साधना नूतन संस्कारोंको अंकित नहीं होने देती है । ऐसेमें साधनाकी अखण्डता रहनेपर चित्तमें जो पूर्व जन्मके संस्कार होते हैं, वे भी नष्ट हो जाते हैं, इसप्रकार वृद्धावस्था आनेतक मन आनंदी एवं अनासक्त हो जाता है; इसलिए पूर्वकालके लोगोंंकी वृद्धावस्था भी आनन्ददायक होती थी, उनका मुख साधनाके तेजसे चमकता था, उन्हें वृद्धावस्थामें आजके समान अनेक प्रकारके मानसिक रोग नहीं होते थे ! बाल्यकालसे ६० वर्षकी आयु होते-होते वे अनासक्त हो जाते थे । यदि घरमें रहते थे तो उनका अधिक समय ग्रन्थ-वाचन, भजन-कीर्तन, सत्संग इत्यादिमें ही व्यतीत होता था, अन्यथा अधिकांश गृहस्थ किसी सन्तके आश्रममें वानप्रस्थी जीवन व्यतीतकर, अपना मनुष्य जीवन सार्थक करते थे ! इससे ही बाल्यकालमें साधनाका महत्त्व क्यों अंकित करना चाहिए ?, यह ज्ञात होता है !



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