अल्पायुसे ही साधना करना क्यों आवश्यक है ? (भाग – ४)


मृत्यु निश्चित है; परन्तु उसके आगमनका समय हमें ज्ञात नहीं होता । मृत्यु कभी भी आ सकती है; अतः मैं बुढापेमें साधना करूंगी/करूंगा, इसप्रकारका दृष्टिकोण पूर्णत: त्रुटिपूर्ण है । मनुष्य जीवनके दो उद्देश्य हैं – पहला, प्रारब्धको भोगकर समाप्त करना और दूसरा, साधनाकर आध्यात्मिक प्रगति करना । प्रारब्धका भोग तो स्वतः ही समाप्त हो जाता है; परन्तु साधना करनेके लिए खरे पुरुषार्थकी आवश्यकता होती है; अतः मनुष्य जन्म, जो बडे भाग्यसे मिलता है, उसका सदुपयोग साधनामें अवश्य ही करना चाहिए एवं साधनाका संस्कार बाल्यकालसे अंकित होनेपर मनुष्य जीवन सार्थक हो जाता है ।



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