अन्न झूठा न छोडे


आजकल अनेक व्यक्ति भोजनको झूठा छोड देते हैं, वह एक प्रकारसे ब्रह्म रुपी अन्नका अपमान करना है । भोजनमें मीनमेख निकालनेसे भी भोजनकी अवमानना होती है, जो प्राप्त हुआ है, उसे कृतज्ञताके भावसे ग्रहण करनेसे भोजनसे सभी देहोंका पोषण होता है । भोजन इस शरीरको जीवित रखनेका एक माध्यम है; अतः वह हमें सदैव सुलभतासे प्राप्त हो, इस प्रकार अपने इष्टसे प्रार्थना करना चाहिए ।  इस तथ्यकी पुष्टि यह शास्त्रवचन करता है –
पूजयेदशनं नित्यमद्याच्चैतदकुत्सयन् ।
दृष्ट्वा हृष्येत्प्रसीदेच्च प्रतिनन्देच्च सर्वशः ।। – मनुस्मृति

अर्थ : मनुष्यको जैसा भोजन प्राप्त हो उसे देखकर मनमें प्रसन्नता अनुभव करे, उसे बिना निंदा किए, सम्पूर्ण सेवन करे, जूठन नहीं छोडे । प्राप्त भोजनकी प्रशंसा करे तथा मनमें किसी प्रकारकी हीन भावना नहीं लाए । मुझे ये अन्न सदैव प्राप्त हो, इस प्रकार उसका प्रतिनन्दन करे ।



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