अपने वास्तुको बनाए आश्रम समान चैतन्यमय (भाग- १)


साधको, अपने घरको आश्रम समान चैतन्यमय बनानेका प्रयास करें, आनेवाले आपातकालमें तभी आपका वास्तु अस्तित्त्वमें रहेगा और आपका रक्षण भी करेगा, साथ ही साधना हेतु वह पोषक भी होगा । इस हेतु निम्नलिखित प्रयास करें और यह तथ्य आपके अंतर्मनमें अंकित हो इसलिए यह लेख शृंखला आरम्भ कर रही हूं, इसे गम्भीरतापूर्वक अपने जीवनमें उतारनेका प्रयास करें ।
 अपने घरको अपने गुरुका आश्रम या आपके आराध्यका मंदिर है, यह समझकर उसमें रहें ! वे हमें सतत देख रहे हैं, ऐसा भाव रखें । हम जिसप्रकार किसी आश्रममें रहते हैं वैसा वर्तन करें ! अर्थात गुरुको हमसे जिसप्रकारका वर्तन अपेक्षित है वैसा करनेका प्रयास करें ।  यह संस्कार मनमें अंकित हो इस हेतु अपने गुरुको कृतज्ञता व्यक्त करें कि उन्होंने हमें अपने आश्रमरुपी घरमें रहनेका सुअवसर दिया है । बोलते समय भी यह हमारे श्रीगुरुका ही आश्रम है , मैं मात्र इसका चाकर हूं, यह भाव रखें । जैसे आश्रममें प्रवेश करनेसे पूर्व हम अपने पादत्राण (चप्पल और जूते) उतारकर अपने पांव धोते हैं वैसे ही घरमें प्रवेश करनेसे पूर्व यह कृत्य करें । यदि ऐसा आपके लिए सम्भव न हो तो घरके प्रवेशद्वारपर एक लोटेमें जल रखें और घरमें घुसनेसे पूर्व उस जलको छिडककर निम्नलिखित श्लोक बोलें । 
ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा। यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यान्तरः शुचिः॥
उसके पश्चात अपने प्रसाधन गृहमें (स्नानगृहमें) जाकर सर्वप्रथम अपने पांवको अच्छेसे धोलें एवं थोडेसे जलको स्वयंके ऊपर छिडक लें और यह प्रार्थना करें कि जो भी अनिष्ट आवरण मुझपर बाहरसे आया हो वह नष्ट हो और जो भी अनिष्ट शक्तियां हमारे साथ आई हो वे इस वास्तुसे चली जाएं एवं मेरा अंतर और बाह्य शुद्धि हो ।
(तीन दिवस पूर्व मैं धर्मरथसे (आश्रम वाहनसे) कहींसे आ रही थी कि अकस्मात खुले नत्रोंसे एक दृश्य दिखाई दी जो बहुत ही भयावह था, चारों ओर हाहाकार मचा हुआ था, लोग चीख-चिल्ला रहे थे, प्राकृतिक आपदाओं एवं वैश्विक युद्धके कारण चहूं ओर घर भरभराकर गिर रहे थे, घरोंमें आग लगे हुए थे, उसमें लोग अपने प्राण बचाने हेतु भागने या निकलनेका प्रयास कर  रहे थे । मुझे समझमें आ गया अब आपातकालको अधिक समय नहीं बचा है ! मैंने सोचा और क्या किया जाए जिससे इस कालमें साधकों और भक्तोंका रक्षण हो सके तो ध्यानमें आया कि उनके घरको आश्रम समान बनाने हेतु प्रबोधन किया जाए इसलिए इस लेख श्रृंखलाको आरम्भ करनेका विचार आया ।) 



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