आपातकालमें देवताको ऐसे करें प्रसन्न ! (भाग-४)


प्रसाद बनाने हेतु अग्निदेवको करें प्रार्थना
         मैंने अपनी नानी और दादीको देखा था कि जब भी वे अङ्गीठी जलाती थीं तो सबसे पहले नमस्कार करती थीं और उसमें कुछ भी पकवान बनानेसे पूर्व उसे अङ्गीठीमें अग्नि देवको अर्पण करती थीं । मैं यद्यपि उस समय बहुत छोटी थी; किन्तु मेरी स्मरण शक्ति अच्छी है तो मेरी स्मृतिमें ये सर्व तथ्य रह गए  ! जबतक हमारे घरपर भी कोयलेकी अङ्गीठीका उपयोग होता था तो मैंने अपनी माताजीको भी दाल या चावलके कुछ दाने अङ्गीठीमें डालते देखा था । उसके पश्चात धीरे-धीरे सभीके घरोंमें गैसवाली अङ्गीठी आ गई । हमारे घरमें बहुत पूजा-पाठ व कर्मकाण्डके अन्य अनुष्ठान होते थे; इसलिए माताजी सात्त्विक रीतिसे सब करती थीं । उनके लिए पवित्रता, बहुत ही महत्त्वपूर्ण घटक हुआ करता था । मैंने अन्नपूर्णा कक्षकी पवित्रताकी कुछ बातें तो उनसे ही सीखी हैं एवं शेष अपने श्रीगुरुसे सीखा है, जो उन्होंने स्वयं तो नहीं सिखाया; किन्तु उनके अनेक माध्यम मुझे सिखाते रहे हैं ।
            वर्तमान कालमें सभी घरोंमें गैसवाली अङ्गीठी है तो उसमें हम अग्नि देवको कुछ भी अर्पण नहीं कर सकते हैं, ऐसेमें जब हम प्रातः काल अन्नपूर्णा कक्षमें अपनी सेवा आरम्भ करते हैं तो सर्वप्रथम उन्हें प्रार्थना करें, “हे अग्निदेव, मैं आजकी सेवा आपकी कृपासे आरम्भ कर रही हूं, आप इस आपातकालमें भी हमारे लिए यहां इस आधुनिक माध्यमसे उपलब्ध हैं, इस हेतु हम आपके कृतज्ञ हैं । आज हम जो भी प्रसाद बनाएं, उसमें आवश्यक तेज तत्त्व आप ही समाहितकर उसे ग्रहण करने योग्य बनाएं । आपकी कृपादृष्टि हमपर इसी प्रकार बनी रहे, ऐसी आपसे प्रार्थना है ।” यह प्रार्थना करनेके पश्चात ही अङ्गीठीपर प्रसादका पात्र रखें !
आपको आज दो और बातें बता देती हूं कि यदि सम्भव हो तो गोपालन आरम्भ करें एवं गोबर गैसवाली अङ्गीठी लगवा लें; क्योंकि तृतीय युद्धके मध्य या उसके पश्चात हमें ‘CNG’ गैसवाली अङ्गीठी प्राप्त करना अत्यन्त कठिन हो जाएगा; इसलिए कह रही हूं, अभीसे अग्निदेवको प्रसन्न रखें ! साथ ही यदि आपके पास खुला आङ्गन है तो गोबरके कण्डे (उपले, गोएठा) या लकडी या कोयलेसे एक समयके कुछ व्यञ्जन बनानेकी वृत्ति निर्माण करें, जिससे आनेवाले कालमें आपको अधिक कष्ट न हो ! हमने तो आश्रममें कण्डेके या लकडीकी अङ्गीठी बनाने हेतु एक अन्नपूर्णा कक्ष पृथक रूपसे बनानेका नियोजन कर लिया है और हमारे गोवंशको जो दलिया देते हैं, उसे हम कण्डेमें ही पकाते हैं और दूध भी कण्डेकी अङ्गीठीमें ही उबालते हैं, अर्थात मैं जो आपको बता रही हूं, उसे स्वयं आचरणमें ला रही हूं; क्योंकि मेरा मानना है कि जब हम कोई कृत्य करनेके पश्चात उसे आचरणमें लाते हैं तो ही लोग उसे सहज करने लगते हैं और लोगोंको उसका लाभ भी मिलता है ।


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