अपने घरकी भीतोंकी रंग रखें सात्त्विक


आजकल तैलरंग (ऑइल पेण्ट) विक्रय करनेवाले अनेक व्यापारिक प्रतिष्ठान नित्य नूतन रंगों एवं पद्धतियोंसे (पैटर्नसे) घरको रंगनेका विज्ञापन देते हैं । सामान्य हिन्दुओंको सत्त्व-रज-तमका ज्ञान न होनेके कारण वे ऐसे विज्ञापनोंकी ओर त्वरित आकृष्ट होते हैं । जैसे कुछ लोग सुगापंखी या काले रंगसे अपनी भीतोंको रंगते हैं तो कुछ चटख लाल या बैंगनी रंग अपने बच्चोंके कक्षमें डालते हैं । हमारा वास्तु जितना सात्त्विक होगा हमारे घरमें सुख-शान्ति और समृद्धि उतनी ही अधिक होगी, इस सिद्धान्तको ध्यानमें रखकर वास्तुको सात्त्विक रखनेका प्रयास करें ! अतः भीतोंको पारम्परिक रंगोंसे ही रंगें ! घरके लिए श्वेत, हलका पीला या नीला तथा चन्दन, ये रंग ही उत्तम होते हैं, शेष रंगोंसे घरमें रज या तमका प्रमाण बढ सकता है, जिससे मन विचलित रहना, नींद न आना,   बच्चोंका पढाईमें मन एकाग्र न होना इत्यादि कष्ट हो  सकते हैं । साथ ही आजकल एक और तथ्यका प्रचलन  बढ गया है । आजकल लोग भीतोंपर रंगसे भिन्न प्रकारके आकार बनवाते हैं, जो अधिकांशतः तामसिक होते हैं,  मैं इसके कुछ चित्र आपसे साझा कर रही हूं, आपने अपने घरमें भी ऐसा तो नहीं करवा रखा है, यह देखें ! यदि   ऐसा है तो उसे हटा दें; क्योंकि ऐसी आकृतियोंसे अनिष्टकारी स्पन्दन आते हैं, जो मन एवं बुद्धिपर अनिष्टकारी परिणाम डालते हैं ।

इस सम्बन्धमें मैंने धर्मप्रसारके मध्य अनेक अनुभव एवं अनुभूतियां हैं, इनमेंसे दो अनुभूतियां यहां प्रस्तुत कर रही हूं :-

  • अगस्त २०१२ में मैं नवी मुंबईमें एक साधकके घर सत्संग ले रही थी । उस सत्संगमें एक स्त्री आई थी, जो पूरा सत्संग ध्यानसे सुन रही थी । सत्संगके पश्चात उन्होंने मुझे कहा, “आपने आज वास्तुके सम्बन्धमें जो कुछ बातें बताई है, उसकी अनुभूति मैं ले रही हूं, आप कृपया मेरे घर चलें और मेरे युवा पुत्रको सब समझाएं, हम दोनों पति-पत्नी उसके आचरणसे बहुत व्यथित हैं !” मैं भी सूक्ष्मसे सब अभ्यास करनेकी दृष्टिसे उनके घर गई, जो उसी भवनमें था । उनके घरमें जब उनके पुत्रके कक्षमें गई तो मेरी सांसें जैसे उखडने लगी, इतना कष्ट था उस कक्षमें ! उस पूरे कक्षकी गृहसज्जा (इंटीरियर्स) सुनहरे और काले रंगमें की गई थी, जिसमें काले रंगका भाग अस्सी प्रतिशत था । उस कक्षको देखकर मैंने उनसे पूछा, “क्या आपका पुत्र तन्त्रमार्गसे साधना करता है ?” तो उन्होंने कहा, “नहीं, वह कोई साधना नहीं करता है; किन्तु वह बहुत हठी और अहंकारी है, हम दोनोंकी कोई बात नहीं सुनता है, अभीतक नित्य नूतन व्यापारमें हमारे लाखों रुपये डुबो दिए हैं, कुछ बोलो तो आत्महत्या करनेकी धमकी देता है, उसे अवसाद भी है और वह अपने कक्षमें ही पडा रहता है और जबसे उसने इस कक्षकी गृहसज्जा कराई है, उसके मानसिक कष्ट बहुत अधिक बढ गए हैं ।”

प्रत्यक्षं किं प्रमाणं, इस कहावतको मैंने उस घरमें चरितार्थ होते देखा, इससे वास्तु सम्बन्धी ऐसे सूक्ष्म ज्ञानपर मेरा और विश्वास हो गया । मैंने उन्हें और उनके पुत्रको सब कुछ अच्छेसे बताया; किन्तु पुनः उनके यहां मुझे जानेकी सन्धि नहीं मिली; इसलिए मुझे ज्ञात नहीं कि उन्होंने मेरे बताए तथ्योंका कितना पालन किया होगा और उसका क्या परिणाम हुआ होगा ?

एक और अनुभूति एक साधिकाकी है, जो ऑस्ट्रियाकी राजधानी विएनामें रहती है ।

अयोग्य एवं तमोगुणी गृहसज्जाके कारण हुई कष्टप्रद अनुभूति

  • पिछले वर्ष ही जब पूज्या तनुजा मां हमारे घर आईं थीं तो उन्होंने कहा था कि घरके कक्षमें भीतें (दीवारें), चादरें, ‘अलमारियां’ काले रंगकी नहीं होनी चाहिए । मेरे युवा भाईने हमारे मना करनेपर भी अपने कक्षमें काले और श्वेत रंगसे सभी साज-सज्जा (इंटीरियर्स) करवाई । जब पूज्या मां यूरोप प्रवासके मध्य हमारे यहां कुछ दिवस रुकीं थीं तो उन्होंने मेरे भाईको सब कुछ समझाया और मैं आश्चर्यचकित थी कि मेरे भाईको सब कुछ समझमें आ गया और उसने सबकुछ परिवर्तित करने हेतु हामी भी भर दी ।

वह जबसे उस कक्षके काले और श्वेत ‘इंटीरियर्स’ होनेपर वहां सोने लगा तो उसे स्वयं भी लगा कि वह चिडचिडा हो गया है और उसकी कमरमें वेदना भी रहने लगी है । पूज्या तनुजा मांके जानेके पश्चात जब एक दिवस मैं रात्रिके समय उस कक्षमें सोने गई तो सम्पूर्ण रात्रि मुझे अवसाद होने लगा और मेरे भविष्यके विषयमें उलटे-सीधे विचार आते रहे, इससे मुझे समझमें आया कि पूज्यबमांने जो कहा था उसमें कितनी सत्यता थी ! – एक साधिका, आयु २३ वर्ष, विएना,   ऑस्ट्रिया (९.६.२०१५)



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