अपनी उपास्य देवता हम निर्धारित करते हैं या गुरु निर्धारीत करते हैं, कृपया बतानेकी कृपा करें और सारे देवताओंमें किसे आराध्यदेव मानें ? – दीपाली गोंडाजे, सांगली, महाराष्ट्र
अध्यात्ममें मनानुसार साधनाको अंश मात्र भी महत्व नहीं है ! ईश्वर हमें उसी कुलमें जन्म देते हैं जिस कुलमें जन्म लेकर उस कुलकी कुलदेवताकी उपासना करके सर्वाधिक प्रगति कर सकते हैं ! हम सबके सूक्ष्म पिण्डमें जिस घटककी न्यूनता होती है, उसीकी साधना करनेसे हमारी शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति होती है इसलिए हमें उसी कुलमें जन्म मिलता है जिस कुलके देवताकी उपासनासे हमारी शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति हो ! चूंकि हम सब भिन्न-भिन्न हैं इसलिए हम सबके कुलदेवता भिन्न-भिन्न होते हैं ! और गुरु तो एक ऐसे आध्यात्मिक चिकित्सक होते हैं जो सूक्ष्मसे हमारे पिण्डके तत्त्वोंकी न्यूनताको जानकर गुरुमंत्र देते हैं !
इसलिए यदि कुलदेवता ज्ञात हो तो कुलदेवताकी ही साधना करनी चाहिए और यदि वह ज्ञात न हो तो उनके विषयमें पूछताछ कर पता करना चाहिए ! कुलदेवताके जप पूर्ण होनेपर हमारे जीवनमें गुरुका पदार्पण स्वयं हो जाता है !
कुलदेवताके नामकी जानकारी न हो पाए तो जो देवता आपको सर्वाधिक प्रिय हो ऐसे किसी एक देवताकी एकनिष्ठ होकर भक्तिभावसे साधना करनी चाहिए ऐसेमें या तो कुलदेवताका नाम ज्ञात हो जाता है, कोई सन्त हमारी भाव-भक्तिसे प्रसन्न होकर शिष्यके रूपमें अपनाकर गुरुमंत्र दे देते हैं !
कुलदेवताका जप क्यों करना चाहिए यह पूर्वके लेखोंमें बहुत बार बताया जा चुका है !
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