आरिब मजीदको मुम्बई उच्च न्यायालयने दी प्रतिभूति, युवा अवस्थामें पथभ्रष्ट होकर गया था सीरिया
०७ मार्च, २०२१
आरिब मजीद २१ वर्षकी आयुमें २०१४ में ३ अन्य लोगोंके साथ ‘आईएस’में सम्मिलित होने सीरिया गया था । उन दिनों वह ‘सिविल’में यान्त्रिकीमें स्नातकका शिक्षण ग्रहण कर रहा था । वह ६ माह उपरान्त लौट आया था । उसके लौटते ही उसे आतङ्करोधी दलने बन्दी बनाकर राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरणको सौंप दिया था ।
आरिफ मजीदने कहा था कि उसे ‘एनआईए’ और इस्तांबुल स्थित भारतीय दूतावासकी सहायतासे भारत लाया गया था । उसपर ‘आईपीसी’की ‘यूएपीए’की धारा १२५ (भारत शासनकी सहयोगी किसी एशियाई शक्तिके विरुद्ध युद्धका प्रयास) और ‘धारा १८’के अन्तर्गत आरोप लगाए गए थे ।
उसका कहना था कि उसके विरुद्ध आतङ्कवादके असत्य आरोप लगे हैं । विशेष न्यायालयने उसे प्रतिभूति दे दी थी; परन्तु ‘एनआईए’ने उच्च न्यायालयद्वारा उसपर रोक लगा दी थी । मुम्बई उच्च न्यायालयने कहा कि प्रतिवादी एक शिक्षित युवक है । उसने अपना पक्ष शिष्टाचारसे प्रस्तुत किया है । उसे प्रतिभूति देते हुए न्यायालयने आदेश दिया कि उसे प्रथम दो माह पुलिस थानेमें दिनमें दो बार, अगले दो माह सप्ताहमें तीन बार और ‘ट्रायल’ पूर्ण होनेतक सप्ताहमें दो बार पुलिस थानेमें उपस्थित होना होगा ।
आरिब मजीदको प्रतिभूति दे दी गई है । आतङ्कवादी बननेवाले अनेक युवा उच्च शिक्षित हैं; अतः उसका उच्च शिक्षित होना प्रतिभूतिका कारण नहीं माना जा सकता । एक ओर हिन्दू साधु-संन्यासियोंको प्रताडित किया जाता है, तो दूसरी ओर जिहादियोंको उच्च शिक्षित बताकर छोड दिया जा रहा है ? क्या न्यायालय यह कहना चाहता है कि सभी उच्च शिक्षित उपद्रव करेंगे तो न्यायालय उन्हें भटका हुआ बताकर छोड देगा ? यह लज्जाका विषय है और ऐसी दोषपूर्ण न्याय व्यवस्थामें परिवर्तन हेतु हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना अपरिहार्य हो गई है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ
स्रोत : ऑप इंडिया
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