ख्रिस्ताब्द २०१२ में धर्मयात्राके मध्य जम्मू-कश्मीर भी जाना हुआ । वहां एक दिवस जम्मूमें एक विस्थापित कश्मीरी पण्डितके घर भोजन करते समय मैंने सहज ही उनकेद्वारा बनाए दम-आलूकी प्रशंसा की तो वहां उपस्थित एक कश्मीरी पण्डित कहने लगे, “यह तो कुछ नहीं, आप हमारे यहां विवाहके भोजपर आएं, उसमें हम तो अपनी आर्थिक क्षमता अनुरूप पांचसे इक्कीस प्रकारके मांसाहार पकाते हैं ।” मैंने उनसे विनम्रतासे कहा, “अपने पूर्वजोंद्वारा दी गई साधनाकी अमूल्य थातीको अपने जीवनमें न उतारनेके कारण एवं जिह्वाके स्वाद और भोगमें अटक जानेके फलस्वरूप ही आप सबके ऊपर मां शारदाकी अवकृपा हो गई और आपको वह देवभूमि छोड विस्थापितों समान जीवन व्यतीत करना पड रहा है । यह सत्य है कि ऊंचाइयोंपर (पहाडोंपर) ध्यान और तन्त्रकी साधना अधिक सहजतासे हो सकती है, इसीलिए पूर्वोत्तर राज्य और उत्तरमें शक्ति उपासना विशेषकर तन्त्र उपासनाका प्रचलन अधिक रहा है एवं पर्वतों श्रृंखलाओं तथा वहांकी गुहाओंमें आज भी अनेक ध्यानमार्गी गुप्त रूपसे ध्यानरत हैं । शक्ति उपासकोंमें देवी या देवताके रौद्ररूपकी उपासना करते समय अनेक बार प्रतीकात्मक बलिके स्थानपर पशुबलिकी प्रथा आरम्भ हुई; किन्तु जबसे तन्त्र उपासकोंने (शैव एवं शाक्त) दोनोंने ही अपनी जिह्वाके स्वाद हेतु यज्ञके प्रसादके अतिरिक्त मांसाहार करना आरम्भ कर दिया, उनकी साधनाकी शक्ति क्षीण होती चली गई और आज आपको मुट्ठी भर, उन असुरोंने आपको आपके ही भूमिसे खदेड कर दर-दर की ठोकरे खाने हेतु विवश कर दिया है, जिन्हें आप कभी ‘भाई’ मानते थे और आपकी मातृभूमिमें आसुरी साम्राज्य व्याप्त हो गया; अतः कृपया मेरे समक्ष अपने अधर्म एवं भोगका गुणगान न करें, अपितु अन्तर्मुख होकर सोचें कि आप सबसे ऐसा कौन सा अक्षम्य अपराध हो गया कि आपको अपनी देवभूमि रुपी मातृभूमिके सुखसे वंचित होना पडा ? ध्यान रखें, भोग और योगके (साधनाके) उचित सामंजस्यसे ही हम सुखी एवं सम्पन्न रह सकते हैं । साधना छोड भोगमें लिप्त रहनेपर आपको मात्र दुःखकी प्राप्ति होगी ।”
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