‘ॐ’का उच्चारण, ऊर्जाका स्रोत


ॐ ब्रह्माण्डकी वह ऊर्जावान ध्वनि है, जो ब्रह्माण्डके अस्तित्वमें आनेसे पूर्वकी प्राकृतिक ध्वनि थी । ये पृथ्वी एवं उसपर होनेवाले जीव जगत हेतु शक्ति, यश, बल, बुद्धिके लिए प्रेरणा देनेवाला प्रथम स्तम्भ बना ।

वेद शास्त्रोंके अनुसार, इसके उच्चारण मात्रसे ही आन्तरिक दृढता एवं ऊर्जा प्राप्त होती है ।

इसका उच्चारण, स्वास्थ्यवर्धक एवं रोगोंको दूर करनेमें सहायक होता है । इसकी ऊर्जा हमारे शरीरके विषैले पदार्थ बाहर निकालकर, शरीरको निर्मल एवं सात्त्विक बना देती है । इसके उच्चारणके कम्पनसे रीढकी अस्थि पुष्ट हो जाती है ।

इसकी ऊर्जासे हम तनावमुक्त हो सकते हैं । दाहिने हाथमें तुलसीकी बडी पत्ती लेकर इसका १०८ बार जप करनेसे, इसके उच्चारणकी ध्वनिसे हमारे चारों ओर सकारात्मक ऊर्जाका सञ्चार होने लगता है ।

सनातन धर्ममें प्रत्येक मन्त्रके उच्चारणसे पूर्व इसका उच्चारण किया जाता है । विदेशी वैज्ञानिकोंने भी यह सिद्ध किया है कि इसके उच्चारणसे जो ऊर्जा निकलती है, वह पूर्ण विज्ञान सम्मत है ।

इसके उच्चारणसे शरीरमें स्पन्दन एवं ध्वनि उत्पन्न होती है, जो स्वर तन्त्री एवं नाडीमें अनुभव की जा सकती है । इससे शरीरके छिद्र खुल जाते हैं । रक्तचाप नियन्त्रित होने लगता है ।

इसके उच्चारणसे हम अपनी स्मरण शक्तिको और भी सुदृढ बना सकते हैं ।

पतंजलिके योग सूत्रमें ‘ॐ’को उपासनासे ईश्वरतक पहुंचनेका मार्ग बताया गया है ।



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