भारतको अंग्रेजी साम्राज्यसे मुक्त करानेमें आजाद हिन्द फौजका है अमूल्य योगदान


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अंग्रेजोंकी सत्तासे राष्ट्रको स्वतन्त्रता दिलानेमें ‘आजाद हिन्द फौज’की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका है; किन्तु कपटी कांग्रसीने इस सत्यको सदैव ही भारतियोंसे छुपाये रखनेका प्रयास किया है और भारतको स्वतंत्र करवानेका श्रेय गांधी-नेहरु लेते रहे हैं |
खरे अर्थोंमें ख्रिस्ताब्द ४ जुलाईको हुई थी ‘आजाद हिन्द फौज’की स्थापना
रासबिहारी बोसने जापानियोंके सहायतासे दक्षिण-पूर्वी एशियासे जापानद्वारा एकत्रित ४००००  भारतीय स्त्री-पुरुषोंकी प्रशिक्षित सेनाका गठन आरभ किया था और उसे नाम दिया आजाद हिन्द  फौज और उसका प्रमुख अधिकारी (कप्तान) मोहन सिंहको बनाया । आरम्भमें इस फौजमें उन भारतीय सैनिकोंको लिया गया था जो जापान द्वारा युद्धबन्दी बना लिये गये थे । कुछ समय पश्चात् इसमें बर्मा और मलायामें स्थित भारतीय स्वयंसेवक भी भर्ती किए गए । भारतको अंग्रेजोंके चंगुलसे सैन्य बलद्वारा मुक्त कराना ही इस सेना (फौज) का उद्देश्य था ।
इधर कांग्रेसके साथ राजनीतिक आन्दोलन कर रहे नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ५ दिसम्बर, १९४० को कारागारसे मुक्त हो गए; परन्तु उन्हें कोलकातामें अपने घरपर ही बन्दी बना दिया गया । १८ जनवरी, १९४१ को नेताजी गुप्तरूपसे काबुल होते हुए जर्मनी जा पहुंचे और वहां हिटलरसे भेंट की । वहीं सरदार अजीत सिंहने उन्हें ‘आजाद हिन्द लश्कर’के बारेमें बताकर इसे और व्यापक रूप देनेको कहा । जर्मनीमें बन्दी ब्रिटिश सेनाके भारतीय सैनिकोंसे सुभाष बाबूने भेंट की । अपने देशप्रेमसे युक्त वक्तव्यसे प्रभावित कर उन्होंने भारतीय बन्दियोंके समक्ष भारतको स्वतन्त्र कराने हेतु सेनाके गठनका प्रस्ताव रखा गया तो उन सभीने इस प्रस्तावका स्वागत किया ।
जापानमें रासबिहारी बोसद्वारा निर्मित ‘इण्डिया इण्डिपेण्डेस लीग’ (आजाद हिन्द संघ) का जून १९४२ में एक सम्मेलन हुआ, जिसमें अनेक देशोंके प्रतिनिधि उपस्थित थे । इसके उपरान्त रासबिहारी बोसने जापान शासनकी सहमतिसे नेताजीको आमन्त्रित किया । मई १९४३ में जापान आकर नेताजीने जापानी प्रधानमन्त्री जनरल तोजोसे भेंट कर अंग्रेजोंसे युद्धकी अपनी योजनापर चर्चा की । १६ जूनको जापानी संसदमें नेताजीको सम्मानित किया गया ।
नेताजी ४ जुलाई, १९४३ को ‘आजाद हिन्द फौज’के प्रधान सेनापति बने । जापानमें बन्दी ब्रिटिश सेनाके ३२,००० भारतीय तथा ५०,००० अन्य सैनिक भी इस सेनामें सम्मिलित हो गए । इस सेनाकी कई वाहिनियां गठित की गईं । वायुसेना, तोपवाहिनी, अभियन्ता, ‘सिग्नल’, चिकित्सा दलके साथ ‘आजाद ब्रिगेड’ तथा ‘रानी झांसी ब्रिगेड’ जैसी कई वाहिनियां भी बनाई गईं । इसका गुप्तचर विभाग और अपना ‘रेडियो’ स्टेशन भी था । नेताजीने एक समारोहमें ६०,००० लोगोंको सम्बोधित करते हुए कहा भी कि यह सेना न केवल भारतको स्वतन्त्रता प्रदान करेगी; अपितु स्वतन्त्र भारतकी सेनाका भी निर्माण करेगी । हमारी विजय तब पूर्ण होगी, जब हम आंग्ल (ब्रिटिश) साम्राज्यको देहलीके लाल ‘किले’में गाड देंगे । आजसे हमारा परस्पर अभिवादन ‘जय हिन्द’ और हमारा घोषवाक्य (नारा) ‘देहली(दिल्ली) चलो’ होगा ।
नेताजीने ४ जुलाई, १९४३ को ही ‘तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा’का उद्घोष किया । जब भारत स्वतन्त्रताके लिए संघर्षरत था और नेताजी ‘आजाद हिन्द फौज’के लिए सक्रिय थे तब ‘आजाद हिन्द फौज’में प्रविष्ट होने आए सभी युवक-युवतियोंको सम्बोधित करते हुए नेताजी सुभाषचन्द्र बोसने कहा, तुम मुझे रक्त दो, मैं तुम्हें स्वतंत्रता दूंगा (तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा ।) प्रत्युत्तरमें सभामें उपस्थित सहस्रों लोगोंने कहा, ‘हम अपना रक्त देनेको सिद्ध (तैयार) हैं |” और प्रतिज्ञा-पत्रपर हस्ताक्षर करने उमड पडे । नेताजीने उन्हें रोकते हुए कहा, “इस प्रतिज्ञा-पत्रपर साधारण मषीसे (स्याहीसे) हस्ताक्षर नहीं करने हैं । वही आगे बढे जिसकी धमनियोंमें सच्चा भारतीय रक्त बहता हो, जिन्हें अपने प्राणोंका मोह न हो और जो स्वतन्त्रताके लिए अपना सर्वस्व त्यागनेको सिद्ध हो़ ।”
नेताजीकी बात सुनकर सबसे पहले सत्रह भारतीय युवतियां आगे आईं और अपनी कटिपर (कमरपर) लटकी छुरियां निकाल कर, झटसे अपनी अंगुलियोंपर छुरियां चलाकर अपने रक्तसे प्रतिज्ञा-पत्रपर हस्ताक्षर करने लगीं । महिलाओंके लिए ‘रानी झांसी रेजिमेंट’का गठन किया गया जिसकी प्रमुख (कैप्टन) बनी लक्ष्मी सहगल । कैप्टेन शाहनवाजके नेतृत्वमें ‘आजाद हिन्द फौज’ने रंगूनसे (वर्तमानमें यांगून) देहली प्रस्थान किया और अनेक महत्त्वपूर्ण स्थानोंपर विजय पाई; परन्तु अमेरिकाद्वारा जापानके हिरोशिमा और नागासाकी नगरोंपर परमाणु बम डालनेसे युद्धका पासा पलट गया तथा जापानको आत्मसमर्पण करना पडा । यह स्थिति ‘आजाद हिन्द फौज’के लिए अनुकूल नहीं थी, तथापि भारतकी स्वतन्त्रताके इतिहासमें ‘आजाद हिन्द फौज’का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान है । आजाद हिन्द फौज आज भी लाखों भारतवासियोंके हृदयोंमें अपना स्थान बनाए हुए है । अंग्रेजोंने भारतपर १९० वर्ष शासन किया । इस कालमें अनेकानेक प्रकारसे अंग्रेजोंके विरुद्ध संघर्ष हुए | १८५७ का स्वतन्त्रता संग्राम हो या विभिन्न राजाओं का सशस्त्र संघर्ष, क्रान्तिकारियोंका संघर्ष हो या शान्तिपूर्ण अहिंसक असहयोग आन्दोलन हो अथवा कांग्रेसनीत ‘भारत छोडों’ आन्दोलन जैसे विभिन्न आन्दोलन हों; परन्तु इन विदेशी शासकोंके विरुद्ध एक सुसंगठित युद्धकी सिद्धता हेतु सुभाषचन्द्र बोसने ‘आजाद हिन्द फौज’का नेतृत्व प्राप्त होते ही अपनी दूरदर्शिता और कुशल प्रबन्धन क्षमताका परिचय देते हुए, इसमें तथा इसकी कार्यशैलीमें जो क्रान्तिकारी परिवर्तन किए तथा कार्य किया, उसीके परिणामस्वरूप अंग्रेजोंमें भय व्याप्त हुआ | यद्यपि इस बातको कभी श्रेय नहीं दिया गया और अहिंसक आन्दोलनोंको स्वतन्त्रताका श्रेय दिया जाता रहा; परन्तु यह भी सत्य है कि जिन देशोंमें इसप्रकारके कथित अहिंसक आन्दोलन नहीं हुए, कालान्तरमें वे देश भी स्वतन्त्र हो ही गए या अंग्रेजोंको उन्हें स्वतन्त्र करना पडा | इसके पीछे अनेक कारण थे, जैसे द्वितीय विश्व युद्ध पश्चात् विश्वकी स्थितिमें अंग्रेजोंकी दृष्टिसे प्रतिकूलता, सम्पूर्ण विश्वमें अंग्रेजोंके अत्याचारके प्रति पनपता आक्रोश और सशस्त्र संघर्ष | ऐसी ही परिस्थितियोंमें ‘आजाद हिन्द फौज’की गतिविधियोंने अंग्रेजोंमें भय व्याप्त किया | चतुर अंग्रेज भारतीय जलसेनामें होनेवाले भावी विद्रोहको भी भांप गए थे और किसी भांति ‘सम्मानपूर्वक’ भारतसे विदा चाहते थे | इसीलिए उन्हें अपनी रणनीतिमें परिवर्तन करते हुए भारतको अपने शासनसे मुक्त करना पडा | नेताजीकी स्वतन्त्र सेना अर्थात् ‘आजाद हिन्द फौज’से प्रताडित और भयभीत अंग्रेजोंने अपना खोखला सम्मान बचाते हुए राजनीतिक सन्धि की और सत्ताका हस्तान्तरण कर दिया; परन्तु इसकी पृष्ठभूमि बनानेमें नेताजी और उनकी ‘आजाद हिन्द फौज’ की मुख्य भूमिका थी | उनके तथा ‘आजाद हिन्द फौज’के योगदानको कांग्रेसद्वारा विकृत एवं भेदभावयुक्त इतिहासने भले ही महत्त्व न दिया हो, तथापि ‘आजाद हिन्द फौज’की भूमिकाको भुलाया नहीं जा सकता और हिन्दू राष्ट्रमें इसकी सेनाकी भारतकी स्वतन्त्रतामें महत्त्वपूर्ण भूमिका अवश्य पढाई जायेगी |
“तुम मुझे रक्त दो, मैं तुम्हें स्वतंत्रता दूंगा” (तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा ।) यह उद्घोष कर नेताजीने सम्पूर्ण भारतवर्षमें सशस्त्र संघर्षकी चेतना जगाते हुए, युवाओंमें नवीन उर्जाका संचार किया, जिसकी परिणति कालान्तर में स्वतन्त्र भारतके रूपमें देखनेको मिली | ऐसे राष्ट्राभिमानी नेतृत्वकुशल, क्रान्तिकारी उद्घोषके जनक नेताजी तथा उनकी ‘आजाद हिन्द फौज’को वैदिक उपासना पीठकी ओरसे शत-शत नमन !

 

 



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