बाढे पूत पिताके कर्मे (भाग – १)


धर्म, साधना और नैतिकता नहीं सिखाए जानेके कारण आज समाज अपने कर्मोंको निष्ठासे नहीं करता है ! अर्थात उससे कर्तव्यपालनतक ठीकसे नहीं होता है ! उदाहरण तो इतने हैं कि उसे लिखना सम्भव नहीं, जैसे – न्यायाधीश अर्थात न्यायका अधीश (स्वामी), न्याय धन लेकर करता है तो आप समझ ही सकते हैं कि जो निर्णय वह देता है, वह कितना न्यायसंगत होगा ! अपनी आयको बढाने हेतु वैद्य या चिकित्सकको जिस चिकित्सकीय प्रक्रियाको करनेकी आवश्यकता नहीं होती है, वह भी अपने रोगियोंपर करता है ! शिक्षक विद्यालयमें ठीकसे अपने विद्यार्थियोंको पढाता नहीं है और पुलिस, पीडितकी अपेक्षा बाहुबलियोंका साथ देती है ! राजनेता, ऐसा कोई अधर्म करनेसे पीछे नहीं हटता, जिससे सत्ता उसे मिले और यदि वह सत्तासीन है तो उसे बनाए रख पाए ! ये सब लोग समाजहित और राष्ट्रहितके साथ खिलवाड करते हैं ! न्यायाधीश, चिकित्सक, शिक्षक, सुरक्षाधिकारी (पुलिस), राज्यकर्ता, ये किसी भी सभ्य समाजके अत्यन्त उत्तरदायी पद हैं; जब ऐसे पदोंपर आसीन व्यक्ति पथभ्रष्ट हो जाता है तो समाजमें अराजकता निर्माण हो जाती है और इनके पथभ्रष्ट होनेका मुख्य कारण है, उनकी विवेकशून्यता ! ध्यान रहे, तमोगुणी व्यक्तिका विवेक मर जाता है ! वस्तुत: ये ऐसे पद होते हैं, जिनपर विराजमान होकर, अपने कर्तव्य पालन करनेसे व्यक्ति और समाज दोनों ही सुखी होते है !
शास्त्र कहता है –
अनिर्वेदः श्रियो मूलं लाभस्य च शुभस्य च ।
महान् भवत्यनिर्विण्णः सुखं चानन्त्यमश्नुते ॥
अर्थ : अपने कार्यमें लगा निष्ठावान व्यक्ति सदा सुखी रहता है । धन-सम्पत्तिसे उसका घर भरा-पूरा रहता है । ऐसा व्यक्ति यश-मान-सम्मान पाता है ।
 आजके भ्रष्ट व्यक्ति अधर्म कर धन-सम्पत्तिसे अपना घर तो भर लेते हैं; किन्तु समाजमें वे यश पानेका अधिकारी नहीं होते हैं । धन आधारित उनकी क्षणिक प्रसिद्धि उन्हें नरक यातनासे कभी नहीं बचा सकती है और ऐसे व्यक्तियोंकी सन्तानें तो कभी भी सुखी नहीं होती हैं ! जैसे भ्रष्ट अधिकारियोंकी संतानें अपने पिता समान सम्मानित पद अपनी योग्यताके बलपर कभी नहीं पाती हैं, उनके पिताजी अपनी निठल्ली सन्तानोंका पोषण अपने अधर्मद्वारा अर्जित धनसे करते हुए उन्हें समाजमें सम्मान दिलाने हेतु प्रत्यनशील रहते हैं ! मेरी बातोंपर विश्वास न हो तो अपने आस-पासके सभी भ्रष्ट लोगोंकी सूची बनाएं और उनकी सन्तानोंकी योग्यताकी भी सूची बनाकर मेरे तथ्यकी पुष्टि कर लें । इसलिए कहते हैं, ‘बाढे पूत पिताके कर्मे और खेती उपजे अपने कर्मे’ ! जिस पिताको ऐसी निकम्मी सन्तानें हों, वे भीतरसे कितने दुखी होते हैं ?, यह उन्हींसे पूछें; किन्तु यह उनके ही अधर्म रुपी बीजका परिणाम होता है ! अतः अपना कर्तव्यपालन पूर्ण निष्ठासे करना चाहिए !



Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

सम्बन्धित लेख


विडियो

© 2017. Vedic Upasna. All rights reserved. Origin IT Solution