जुलाई २२, २०१८
गढ थाना क्षेत्रमें रहने वाला पिण्टू निकटकी ७ माहकी बच्चीको खिलानेके लिए ले गया । बच्ची तब अपनी ताईके साथ थी । ताई दृष्टिहीन थी । बच्चीकी मां और दादी पानी लेनेके लिए बाहर गए हुए थे । जब वे लौटीं तो उन्हें बच्ची नहीं मिली । खोजा तो गांवके मैदानमें बच्ची लहूलुहान स्थितिमें मिली । ग्रामीणोंको देखकर पिण्टू भाग गया । बादमें पुलिसने बन्दी बना लिया । ७३ दिवस पुरानी घटनामें न्यायालयने शीघ्रता करते हुए केवल १४ सुनवाईमें दोषीका निर्णय कर दिया । ‘दण्ड विधि संशोधन अध्यादेश २०१८’के लागू होनेके पश्चात प्रदेशमें १२ वर्षसे कम आयुकी बच्चीके साथ दुष्कर्मके प्रकरणमें फांसीका प्रथम दण्ड है । अभियोग विशिष्ट न्यायाधीश जगेन्द्र अग्रवालके (अनुसूचित जाति, जनजाति प्रकरण एवं पॉक्सो अधिनियम) न्यायालयमें चला । २० जूनको अभियोग प्रविष्टके बाद त्वरित सुनवाई आरम्भ हुई । दोषीको न्यायालयने धारा ‘३७६ एबी’में फांसीका दण्ड सुनाया है । इसके अतिरिक्त ‘धारा ३६३’में पांच वर्ष कठोर कारावास और १० सहस्त्रका अर्थदण्ड लगाया है । अर्थदण्ड नहीं भरनेपर एक वर्षका साधारण कारावास मिलेगा दोषीको ‘धारा ३६६’में ७ वर्षका कठोर कारावास और २० सहस्त्र रुपयोंका अर्थदण्ड भी लगाया गया है ।
अलवरमें ७ माहकी बालिकासे दुष्कर्ममें न्यायालयने फांसीका दण्ड देते हुए कहा कि आरोपी निकट रिश्तोंमें विश्वासका दुरुपयोग करते हुए खिलानेके बहाने ७ महीनेकी बालिकाको उसके घरसे सूने स्थानपर ले गया । निर्दयतापूर्ण कृत्य करते हुए दुष्कर्म किया । यदि पिता नहीं पहुंचता तो आरोपी पीडिताके साथ नृशंसताकी पराकाष्ठा करते हुए असहाय बालिकाके साथ हर प्रकारका घृणित अपराध कर देता । यह प्रकरण विरलतम प्रकृतिमें आता है । न्यायालयने दुष्कर्मकी बढती घटनाओंपर चिन्ता दिखाते हुए कहा कि इस प्रकारके व्यक्तिको मृत्युदण्ड नहीं दिया गया तो नए संशोधन अध्यादेशके प्रावधानोंका कोई औचित्य नहीं रह जाएगा । कठोर दण्ड देनेके लिए घटनाके पश्चात न्यायालय आरोपीद्वारा पीडिताकी नृशंस हत्या किए जानेतक प्रतीक्षा करे, यह मेरी दृष्टिमें किसी प्रकार न्यायोचित प्रतीत नहीं होता ।
प्रकरणमें २१ साक्ष्योंके वक्तव्य लिए गए । इनमें ३ प्रत्यक्षदर्शी थे । इसके अतिरिक्त परीक्षण करने वालों ६ चिकित्सकोंके वक्तव्य लिए । एफएसएलका ब्यौरा भी सम्मिलित किया गया । बालिकाको आरोपी उसकी ताईसे लेकर गया । ताई दृष्टिहीन होनेके कारण संज्ञान नहीं कर पाई; लेकिन बालिकाको ताईसे घटनास्थल विद्यालयके मैदानकी ओर ले जाना सिद्ध हुआ । न्यायालयने उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उडीसा व गुजरात राज्योंके उच्च न्यायालयद्वारा दिए गए निर्णयोंका सन्दर्भ दिया ।
न्यायाधीश जगेन्द्र अग्रवालने ११ मिनटतक उसे पढकर निर्णय सुनाया । निर्णय सुनाए जानेपर आरोपीके मुखपर कोई भाव दृष्टिगोचर नहीं हुए !
१३ वर्षीय अव्यस्क बेटीके देह शोषणके प्रकरणमें १८ दिवसमें न्यायालयने निर्णय देते हुए दोषी पिताको आजीवन कारावास व ५०००० रुपये अर्थदण्ड दिया है । विशिष्ट न्यायाधीश (लैंगिक अपराधोंसे बालकोंका संरक्षण अधिनियम) गिरीश अग्रवालने शनिवारको ६४ पृष्ठके निर्णयमें कहा है कि ऐसे अपराधोंमें कडा निर्णय न दिया तो न केवल समाजमें वैवाहिक स्थितियां प्रभावित होगी एवं पारिवारिक व्यवस्थापर प्रतिघात होगा ! समाजके नैतिक मूल्योंमें भी गिरावट होगी; क्योंकि अभियुक्तने पिता एवं पुत्रीके सम्बन्धोंको लज्जित किया है । कैथून निवासी व्यक्तिपर आरोप है कि वह ६ माहसे बेटीका देह शोषण कर रहा था । बेटीने जब इस घटनाके बारे में अपनी मांको बताया, तो उसने पतिके विरुद्ध २९ मईको एसपीको परिवाद की । पुलिसने ४ जूनको आरोपीको झालावाडके मनोहर थाना क्षेत्रसे बन्दी बनाया ।
स्रोत : दैनिक भास्कर
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