धर्मधारा


आजकल माता-पिता अपने बच्चोंको अल्पायुमें ही प्रसिद्धि दिलाने हेतु भिन्न प्रकारकी प्रतियोगितामें उत्तीर्ण करने हेतु, उन्हें नृत्य और संगीतमें प्रवीण करते हैं; किन्तु इससे बच्चोंका बालपन नष्ट हो जाता है । अल्पायुमें ही उनपर तनाव आ जाता है जो आयु, खलेने, खाने और उधम-चौकडी करनेकी होती है, उसमें वे सम्पूर्ण दिवस भिन्न प्रकारकी प्रतियोगिता जीतने हेतु अभ्यास करते रहते हैं । वस्तुत: पालकोंको यदि अपने बच्चोंको यशस्वी करना है तो उन्होंने अपने बच्चोंमें अच्छे गुणोंको आत्मसात करवानेका प्रयास करवाने चाहिए, इससे वे बच्चे जिस भी क्षेत्रमें जाएंगे, यश उन्हें मिलेगा ही और उनका बाल्यकाल आनन्दमें बीते, यह देखना माता-पिताका धर्म है ।



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