आजके अधिकांश माता-पिता अपने बच्चोंको सुसंस्कारित नहीं कर पाते हैं एवं जब वे बच्चे थोडे बडे होने लगते हैं तो उन्हें (माता-पिताको) उनके दुर्गुण कष्ट देने लगते हैं और वे उन्हें कोसने लगते हैं या उनके दुर्गुणोंसे दुखी हो जाते हैं !
मात्र जन्म देनेसे कोई माता-पिता पूजनीय नहीं होते, जो माता-पिता अपने बच्चोंमें दिव्य गुणोंको आत्मसात करवानेमें सक्षम होते हैं, वे ही माता-पिता पूजनीय होते हैं, यह तथ्य सभी पालकोंने ध्यान रखना चाहिए और अपने बच्चोंमें अच्छे संस्कार कैसे विकसित करें ?, इस हेतु सतत प्रयास करना चाहिए !
वस्तुत: सुसंस्कार तो गर्भकालसे ही डाले जाने चाहिए ! जैसे –
गर्भवती माताओंने आजकी निर्लज्ज आधुनिक माताओं समान अपने गर्भका प्रदर्शन पाश्चात्य वस्त्रोंको पहनकर नहीं करना चाहिए । गर्भमें पल रहे शिशुका वलय कोमल होता है, उसपर कुदृष्टि या अनिष्ट शक्तियोंके कष्ट होनेकी सम्भावनाएं अधिक होती हैं ! इसलिए गर्भस्थ माताओंने अपने उदरको ढककर रखना चाहिए ! रात्रिमें दस बजेके पश्चात अकेले खुले केशमें कहीं भी विचरण नहीं करना चाहिए या एकान्त स्थानमें अकेले निवास नहीं करना चाहिए । साथ ही, काले वस्त्रोंका या पाश्चात्य वस्त्रोंका प्रयोग पूर्णत: टालना चाहिए ।
देर रात्रि न ही जागना चाहिए और न ही प्रातः देरतक बिना शारीरिक अस्वस्थताके सोना ही चाहिए ! इससे गर्भके मन और बुद्धिपर काला आवरण निर्माण होता है ! गर्भकालमें धूम्रपान, गुटखा, मद्यपान इन सबसे पति-पत्नी दोनोंने ही बचना चाहिए ! आजकल पुरुषोंके साथ स्पर्धा करनेके क्रममें अनेक आधुनिक महिलाएं धूम्रपान एवं मद्यपान करती हैं; किन्तु सामान्य महिलाओंके लिए भी यह अत्यन्त हानिकारक होता है तो गर्भवती स्त्रियोंके लिए यह कितना हानिकारक हो सकता है ?, आप स्वयं सोचें !
गर्भवती महिलाओंको मानसिक तनावसे भी दूर रखना चाहिए, अन्यथा उनके बच्चे भिन्न प्रकारके मनोविकारसे भविष्यमें पीडित होते हैं और अब तो यह आधुनिक शोध भी मानता है !
पाश्चात्य भोजन तमोगुणी होते हैं, अतः ऋतु एवं अपनी प्रादेशिक आहार अनुरूप भोजन लेना सर्वश्रेष्ठ होता है !
ध्यान रहे, माताएं गर्भकालमें जितना अधिक सात्त्विक आचरण करती हैं, शिशु उतना ही तेजस्वी होता है !
गर्भवती स्त्रीने अपने आराध्य देवता या गुरुमन्त्रका अखण्ड नामजप करना चाहिए, धर्मग्रन्थोंका प्रतिदिन दोसे तीन घंटेतक इस भावसे वाचन करना चाहिए कि गर्भस्थ शिशु उसे सुन रहा हो ! यदि गुरु हों, तो उनके आश्रममें जाकर सेवा करनी चाहिए और गर्भके ऊपर कवच रहे, यह प्रार्थना अपने कुलदेवतासे नियमित करनी चाहिए !
पिताने भी इसीप्रकार सात्त्विक आचरण करना चाहिए ! अपने घरकी भी नियमित वास्तु शुद्धि करनी चाहिए, इससे गर्भपात या गर्भपर सूक्ष्म आक्रमणकी सम्भावनाएं न्यून हो जाती हैं ! (क्रमश:)
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