अपने बच्चोंमें सात्त्विक संस्कार कैसे अंकित करें ? (भाग – २)


शिशुके जन्म लेनेपर यदि शिशुमें अधिक शारीरिक कष्ट दिखाई दे तो उसकी मंगलवार और शनिवार नियमित तीन वर्षतक दृष्टि (नजर) उतारनी चाहिए एवं पांच वर्षतक, जब वह सो जाए, तो (उसके) सिरपर हाथ रखकर ‘ॐ श्री गुरुदेव दत्त, ॐ नमः शिवाय’  इस मन्त्रोंका, एकके पश्चात दूसरा मन्त्र (इन्हें एक ही मन्त्र समझें), आधे घंटे प्रतिदिन जप करना चाहिए । इससे बच्चेके ऊपर जो भी अनिष्ट शक्तियोंके कारण आवरण निर्माण हुआ होता है, वह न्यून होता जाता है !
नवजात शिशुका छायाचित्र निकालकर, उसे सभीको तुरन्त नहीं दिखाना चाहिए, यदि यह करना ही हो तो २१ दिवसके पश्चात दिखाना चाहिए । यह मैं क्यों बता रही हूं ?; क्योंकि आज अनेक लोग जैसे ही बच्चेका जन्म होता है, वैसे ही उसकी फोटो ‘फेसबुक’, ‘ट्विटर’ इत्यादि सामाजिक जालस्थलपर डाल देते हैं, इससे भी बच्चेको कुदृष्टि लगनेकी सम्भावना होती है ! वस्तुत: हमारे यहां तो बच्चेको प्रसूति गृहसे बाहर निकालनेकी भी तिथि और मुहूर्त निश्चित किया जाता है; किन्तु अज्ञानता और उत्साहमें हम अपने बच्चोंकी गर्भकालसे ही इतनी हानि कर देते हैं कि उस बच्चेको आजीवन अनेक आध्यात्मिक कष्ट रहते हैंं ! यह सब हिन्दू धर्मके स्थूल और सूक्ष्म पक्ष नहीं सिखाए जानेका परिणाम होता है ! नवजात शिशु जिस कक्षमें रहे, वहां सूर्यका प्रकाश अवश्य ही आना चाहिए और उसके कक्षकी नियमित वास्तु शुद्धि भी होनी चाहिए । स्वच्छता और पवित्रतासे नवजात शिशुको कष्ट होनेकी सम्भावनाएं घट जाती हैं ! यह भी क्यों बता रही हूं ?, क्योंकि आज अनेक शिशुओंको जन्मके कुछ दिवस पश्चात ही कुछ न कुछ कष्ट हो जाता है । कुछ माता-पिता स्वच्छतापर तो ध्यान देते हैं; किन्तु वास्तुकी पवित्रतापर नहीं देते हैं ! प्रसूति गृहमें प्रतिदिन देसी गायके कंडेको जलाकर, उसमें लोबान डालकर प्रातः और संध्या समय धूप दिखाना अति आवश्यक होता है ! साथ ही, दो बार गौ मूत्रका छिडकाव करें एवं उस कक्षमें मृत पूर्वजोंके कोई छायाचित्र न होंं, यह भी ध्यान रखें ! नवजात शिशुको दुग्ध पान कराते समय माताने ‘श्रीगुरु देव दत्त’का जप दो घंटे कमसे कम तीन माह अवश्य ही करना चाहिए । आजकल सभीके घरोंमें पितृदोष है, ऐसेमें अतृप्त पितर, जन्म, मृत्यु और विवाह तीनों महत्त्वपूर्ण घटनाओंके कुछ समय पूर्व एवं पश्चात भिन्न प्रकारके कष्ट देते हैं, ऐसा मैंने अपने सूक्ष्म शोधोंमें पाया है; इसलिए ऐसे आध्यात्मिक उपचार करने अति आवश्यक होते हैं । (क्रमश:)



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