बाढे पूत पिताके कर्मे (भाग – २)


कुछ दिवस पूर्व देहलीमें एक युवा जिज्ञासु मिलने आया था । वह अर्ध विक्षिप्त सा था ! उसे देखकर मेरे पिताद्वारा कही गई एक कहावत ध्यानमें आई, ‘बाढे पूत पिताके धर्मे और खेती उपजे अपने कर्मे’ ! वैसे यह प्रथम बार नहीं है कि मैं किसी विक्षिप्त युवासे मिली हूं, आज अनेक घरोंमें विशेषकर पुत्रोंमें विक्षिप्तता दिखाई देती है और इसका मूल कारण, पिताद्वारा धर्म और साधनाके प्रति उपेक्षा है । जब निधर्मी पिताके पुत्रोंको आध्यात्मिक कष्ट होता है, तो पिता अपने पुत्रको कुपुत्र कहकर कोसते हैं, वस्तुत: उसके लिए वे स्वयं उत्तरदायी होते हैं !
धर्मप्रसार करनेसे एक सीख मेरे मानस पटलपर अवश्य अंकित हो गई है कि धर्म ही सभी लौकिक एवं पारलौकिक सुखोंका मूल कारण है, धर्मके प्रति संवेदनशून्यतासे जीवनमें बुद्धि-अगम्य दुखोंका पहाड टूट पडता है; इसलिए धर्म प्रसार करना अति आवश्यक है  ।  



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