देहलीके वायु प्रदूषणने एक नूतन चर्चाको जन्म दिया है; परन्तु प्रदूषण केवल राष्ट्रीय राजधानी परिक्षेत्रमें (NCR) ही है, ऐसा नहीं है; अपितु सम्पूर्ण विश्वमें यह एक बडी समस्या है और संसारके सभी प्राणी इससे प्रभावित हो रहे हैं, चाहे वे किसी महानगरमें रहते हों अथवा सुदूर उत्तरी अथवा दक्षिणी ध्रुव प्रदेशोंमें ।
पर्यावरण प्रदूषण मण्डलके अनुसार देहलीके वायुमण्डलमें नवम्बर २०१७ के एक दिवस प्रति घन मीटर २०० माइक्रोग्राम पीएम २.५ प्रदूषक तत्त्व पाए गए । यह विश्व स्वास्थ्य संगठनके सुरक्षित मानक स्तरसे ८ गुणा अधिक है और इसपर रोकथाम करनेके उद्देश्यसे कई यन्त्रालयों तथा उद्योंगोंके कार्य करनेपर तात्कालिक प्रतिबन्ध शासन-प्रशासनद्वारा लगाया गया है । प्रदूषणके कारण दृष्टिक्षेत्र अत्यन्त सीमित हो गया और प्रदूषण जनित धुंधके कारण कई वाहन दुर्घटनाग्रस्त भी हुए । यहांतक कि विद्यालयोंमें अवकाशतक घोषित करना पडा । वायु प्रदूषणसे मुक्ति पाने हेतु मानसिक बौद्धिक स्तरपर शासन-प्रशासनने अपनी क्षमतानुसार प्रयास किए; परन्तु क्या केवल इतना ही पर्याप्त है ? विभिन्न विशेषज्ञों अनुसार प्रदूषण वाहनों, यन्त्रों अथवा खेतोंमें ‘पराली’ जलानेके कारण उत्पन्न हुआ है और पेडोंकी घटती संख्याने भी इस समस्याकी वृद्धिमें सहायता की है; किन्तु विचारणीय है कि क्या मात्र यही कारण प्रदूषणके कारक हैं ? या प्रदूषणके मूल कारणों और मूल समस्याओंपर विचार नहीं किया जाना चाहिए ? आज स्थिति यह हो गई है कि मनुष्य जीवनके लिए प्रथम अनिवार्यता, श्वासतक, उसे शुद्ध नहीं मिल पा रही है ।
श्वास बिना मनुष्य जीवनकी कल्पना ही व्यर्थ है और शुद्ध प्राणवायु (ऑक्सीजन) मनुष्यका नैसर्गिक अधिकार है, जो उसे आज इस भौतिकताके ‘अनुयायी’ विश्वमें नहीं मिल रहा है जिसका दोषी भी मनुष्य ही है और उसकी लोभी प्रवृत्ति है । प्रकृतिका योग्य रीतिसे तथा कृतज्ञताके भावसे दोहन किस प्रकार किया जाए ?, यह अपने वेदों तथा पर्यावरण सापेक्ष संस्कृतिके माध्यमसे सम्पूर्ण विश्वको समझानेवाले राष्ट्रकी अर्थात भारतकी राजधानी देहलीमें वायु प्रदूषणका जो साम्प्रतिक संकट है, वह एक विसंगति नहीं तो और क्या है ?, और यह विसंगति अपने राष्ट्रीय मूल चरित्रसे पथभ्रष्ट होनेके कारण ही उत्पन्न हुई है । जिस राष्ट्रमें पर्यावरण शुद्धि हेतु नियमित गोघृतसे यज्ञ-हवन किए जाते हों, वहां गोवध हेतु वधशाला खोलनेकी अनुमति स्वयं शासन देता हो, वहां प्रदूषण होना आश्चर्यजनक नहीं है ।
जिस संस्कृतिमें वृक्षोंको पूजनेकी परम्परा रही हो वहां विकासके नामपर वृक्षोंकी कटाईका क्रम निरन्तर चल रहा है और ‘वृक्षारोपण’ के नामपर ‘पौधरोपण’का नाट्य वर्षोंसे खेला जा रहा हो, वहां प्रदूषणसे मुक्ति कैसे मिलेगी ? वर्षोंसे देशमें ‘पौधे’ लगाए जा रहे हैं और भ्रष्टाचारकी भेंट चढ रहे हैं, उनमेंसे अधिकांश ‘वृक्ष’ बन ही नहीं पा रहे हैं । यदि विगत दशकोंमें देशमें जितना पौधरोपण किया गया, वह भ्रष्टाचाररहित होता तो आज यह पर्यावरणकी समस्या कदापि नहीं होती अर्थात वायु प्रदूषण सहित सभी प्रकारके प्रदूषणके लिए उत्तरदायी मूल रूपसे मनुष्यका धर्माचरणसे विमुख होना ही है । भ्रष्टाचार हो या सुविधाभोगी प्रवृत्ति, ये सभी धर्म-विमुख होनेके ही परिणाम हैं; अतः भौतिक प्रदूषण हो या मानसिक प्रदूषण अथवा आध्यात्मिक प्रदूषण, सभीका समाधान धर्ममें ही है और वर्तमान राजनेताओंकी कार्यप्रणालीको देखते हुए उनसे धर्माचरणकी आशा करना व्यर्थ ही है; अतः पुनः यह सिद्ध होता है कि प्रदूषणसे मुक्ति हेतु भी हिन्दू धर्मराज्यकी स्थापना अपरिहार्य हो गई है । – तनुजा ठाकुर
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