अवयस्क बालिकाके बलात्कारके आरोपीका दण्ड मुम्बई उच्च न्यायालयने किया निरस्त, ‘पोस्को’ विधानमें सहमतिसे यौन सम्बन्धको बताया अपरिभाषित


०६ फरवरी, २०२१
      एक १९ वर्षीय युवकको उसकी चचेरी बहनसे दुष्कर्म करनेके कारण १० वर्षके कठोर कारावासका दण्ड सुनाया गया था । वह लडकी १५ वर्षीय है तथा उसने अपनी सहेलीको बताया था कि उसके भाईद्वारा दुष्कर्म किए जानेसे उसे उदरशूल हो गया है । सहेलीने शिक्षिकाको यह घटना बताई । शिक्षिकाने पीडितासे पूछनेपर उसके साथ हुए यौन उत्पीडनकी घटना ज्ञात हुई । धारा १६४ के अन्तर्गत पीडिताका वक्तव्य लिया गया, जिससे ज्ञात हुआ कि उसका लगभग ४ से ५ बार यौन शोषण हुआ था । लडकीने ‘मैजिस्ट्रेट’के समक्ष वक्तव्य परिवर्तितकर बताया कि उसका पूर्वका वक्तव्य शिक्षिकाके कहनेपर दिया गया था । लडकेको दोषी मानकर उसे न्यायालयने १० वर्षके कठोर कारावासका दण्ड दिया था; परन्तु मुम्बई उच्च न्यायालयने उसे यह कहकर प्रतिभूति (जमानत) प्रदान कर दी कि सहमतिसे यौन सम्बन्ध बनानेके विषयमें ‘पोस्को’ विधानमें कोई स्पष्टीकरण नहीं है । न्यायालयने यह भी कहा कि पूर्वमें प्राप्त प्रतिभूतिका भी आरोपीने दुरुपयोग नहीं किया है ।
      उल्लेखनीय है कि नागपुर ‘बेंच’ने कहा था कि वस्त्रोंके ऊपरसे किया स्पर्श बाल संरक्षण विधानके अन्तर्गत अपराध नहीं माना जाएगा, जबकि एस ए बोबडेकी अध्यक्षतामें सर्वोच्च न्यायालयने इस न्यायपर रोक लगा दी थी । नागपुर ‘बेंच’ने एक घटनामें यहांतक तर्क दिया था कि  लडकीका हाथ पकडना, पेंटकी ‘जिप’ खोलनातक यौन अपराध श्रेणीमें नहीं आता । न्यायमूर्ति पुष्पाका तर्क था कि बिना हाथापाई किसीका बलात्कार अकेले व्यक्तिके लिए असम्भव है ।
       जब ऐसे विधान और न्यायदाता हों, तो देशका वातावरण बिगडना कोई बडी बात नहीं है । ऋषियोंके इस महान देशको इस निकृष्ट लोकतन्त्र, न्यायतन्त्र व संसदमें बैठे नेताओंने झुका दिया है । यह अत्यन्त लज्जाका विषय है, इसलिए अब धर्मनिष्ठ हिन्दू राष्ट्रकी आवश्यकता है । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ 

स्रोत : ऑप इंडिया



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