अपने बच्चोंमें सात्त्विक संस्कार कैसे अंकित करें ? (भाग – ६)


बच्चोंमें स्वभाषाभिमानका बीजारोपण करना प्रत्येक पालकका धर्म है !
पाश्चात्यकरणके प्रभावमें आज सभी रंग चुके हैं और विशेषकर भारतीयोंमें एक भ्रांति फैल चुकी है कि जो जितना पाश्चात्य संस्कृति अनुसार वर्तन करेगा, वह उतना ही सभ्य और आधुनिक माना जाएगा ! इस कुत्सित विचारधाराने इस देशकी संस्कृति, भाषा और वैदिक सनातन धर्मको सर्वाधिक हानि पहुंचाई है ।
कुछ वर्ष पूर्व जब मैं विकसित राष्ट्रकी श्रेणीमें कहे जानेवाले ‘यूरोप’के कुछ देशोंमें धर्मप्रसार हेतु गयी थी तो मैंने पाया कि जर्मनी, ऑस्ट्रीया, इटली इत्यादि यूरोपीय देशोंके नागरिक अपनी भाषाके प्रति अत्यधिक सजग हैं और उसका संगोपन अति उत्तम प्रकारसे करते हैं, उनमें स्वभाषाभिमान कूट-कूटकर भरा हुआ है; परंतु जब हम भारत देशकी स्थिति देखते हैं तो मन क्रन्दन करने लगता है, जिस देशकी मूल भाषा ‘संस्कृत’ है और जिसे सभी भाषाओंकी जननी कहा जाता है, यहां इस भाषाको मृत भाषा घोषितकर, इसकी सर्वाधिक उपेक्षा की गयी है । नेताओंकी प्रदेशवाद एवं क्षेत्रवादकी राष्ट्रद्रोही कूटनीतिके कारण आज तक ‘हिन्दी’को राष्ट्रभाषाके रूपमें इस देशके सभी राज्योंने स्वीकार नहीं किया है । किसी भी राष्ट्रकी एक राष्ट्रभाषा होना अनिवार्य है, उससे राष्ट्र एक सूत्रमें बंधता है; परंतु यहां न ही हिन्दी और न ही संस्कृतको जो सम्मान मिलना चाहिए, वह स्वतन्त्रता पश्चात इतने वर्षोंमें मिल पाया है । आज भी अधिकांश उच्च शिक्षा एवं शासकीय कागदी कार्यवाही आंग्ल भाषामें ही होती है । अभिभावकोंने बच्चोंमें अपनी भाषाके प्रति जो अभिमान और सम्मानकी भावना अन्तर्भूत करनी चाहिए, उसे बालमनपर अंकित नहीं कर पाते हैं ।
  धर्मप्रसारकी सेवाके मध्य अनेक घरोंमें जाना हुआ है और मैंने पाया है कि आजके सम्भ्रान्त वर्ग ही नहीं, अपितु मध्यम-वर्गीय या निम्न मध्यम-वर्गीय परिवार भी आंग्ल भाषाका पोषण करने लगे हैं और जैसे ही बच्चा प्रथम शब्द बोलना सीखता है तो अपने बच्चोंको आरम्भिक कालसे ही मम्मी और पापा या डैडी बोलने हेतु शिक्षित करने लगते हैं ! आज तो जिन बच्चोंको आंग्ल भाषा नहीं आती है या अंग्रेजी माध्यममें उनका शिक्षण नहीं होता है, उनमेंसे अनेकोंमें हीन भावना आ जाती है ।
 राष्ट्र और उसके नागरिकमें अद्वैत सम्बन्ध होता है, यदि इस देशका प्रत्येक व्यक्ति अपनी भाषाके प्रति सजग हो जाए और स्वभाषाभिमानके संस्कार अपने बच्चोंमें अंकित करने लगे, तो इस देशमें क्षेत्रीय भाषा, हिन्दी भाषा और संस्कृत भाषाको पोषण हेतु योग्य वातावरण स्वतः ही प्राप्त होने लगेगा ।
  प्रत्येक पालकने अपने बच्चोंमें स्वभाषा (प्रादेशिक मातृभाषा), संस्कृत भाषा एवं राष्ट्र भाषा हिन्दीके प्रति अभिमानके संस्कार अंकित करते हुए उन्हें सिखानेका प्रयत्न अवश्य करना चाहिए, इससे उनकी संस्कृति, धर्म और राष्ट्रके प्रति ऋणका एक अंश चुकता होता है ।
अपने बच्चोंमें स्वभाषाभिमान जागृत करने हेतु अभिभावकों एवं पालकोंसे निम्नलिखित प्रयत्न अपेक्षित हैं –
१. अपने बच्चोंको मां, पिताजी, अम्मा–बाबा, मां- बाबूजी, जैसे सम्बोधन बचपनसे ही सिखायें । मम्मी-पापा, मॉम-डैड जैसे शब्दोंका न कोई अर्थ है और न ही वह सात्त्विक है, आज तो वैज्ञानिकोंने भी सिद्ध कर दिया है कि संस्कृतनिष्ठ हिन्दी भाषा बोलनेवाले बच्चोंकी मेधा शक्तिके दोनों भाग समान रूपसे विकसित होते हैं और उनकी स्मरण शक्ति अंग्रेजी बोलनेवाले बच्चोंसे अधिक तीक्ष्ण होती है । क्या आप अपने बच्चोंको ऐसी मेधा-शक्ति नहीं देना चाहेंगेंं ?
२. जब बच्चे पढना सीखें तो उन्हें धार्मिक ग्रन्थसे सम्बन्धित सरल बोधप्रद कथाओंवाले ग्रन्थ अपनी मातृभाषामें, या हिन्दीमें पढने हेतु दें ।
३. बच्चोंको बचपनमें सर्वप्रथम ‘ट्विंकल ट्विंकल लिटल स्टार’ के स्थानपर संस्कृतके श्लोक, जैसे ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव’, गायत्री मन्त्र, भिन्न देवताओंकी स्तुतियां, गुरु वंदना, इत्यादि सिखाएं, इससे बच्चोंका उच्चारण शुद्ध होगा और वाणीमें तेजस्विता आएगी ।
४. बच्चोंकी शिक्षा आरम्भ करते समय सर्वप्रथम उन्हें देवनागरी लिपि या अपनी मातृभाषा सिखाएं, अंग्रेजी एक तमोगुणी एवं अपूर्ण भाषा है और इससे बच्चोंकी विद्या आरम्भ करनेसे बच्चोंके मनपर सूक्ष्म काला आवरण निर्माण होता है, जो भविष्यमें मानसिक अस्थिरताके लिए उत्तरदायी होता है । बच्चोंको प्रथम पांच वर्ष अंग्रेजी भाषासे यथासम्भव दूर रखें !
५. जब बच्चे आठवीं, दसवीं या महाविद्यालयमें अतिरिक्त भाषाका चुनाव करें तो उन्हें फ्रेंच, जर्मन इत्यादिके स्थानपर अपनी मातृभाषा या संस्कृत या हिन्दी लेने हेतु प्रोत्साहित करें ।
६. अपने बच्चोंके साथ घरमें अपनी मातृभाषामें ही बोलें, एक शोध अनुसार, स्वतन्त्रता पश्चात अनेक स्थानीय भारतीय भाषाओंका लोप हो चुका है; अतः इस पापमें आप सहभागी न हों, जहां तक सम्भव हो घरमें शुद्ध मातृभाषा या हिन्दी भाषाका प्रयोग करें । आज महानगरोंमें आधुनिकताके रंगमें रंगे माता-पिता अपने दो या तीन वर्षके बच्चोंसे अंग्रेजीमें बात करते दिखाई देते हैं । अपने बच्चोंमें अपने भाषाकी अपेक्षा विदेशी भाषाके प्रति आकर्षण निर्माण करना पालकत्व नहीं, अपितु आपके पालकत्वकी कमीको दर्शाता है ।
७. अपने घरमें अंग्रेजी नहीं, अपितु अपनी मातृभाषा या हिन्दी भाषाके समाचार पत्र या पत्रिकाएं मंगवाएं । वैसे तो आजकलकी ‘प्रिंट मीडिया’में भी हिन्दीका उर्दूकरण एवं अंग्रेजीकरण एक सोचे समझे षड्यन्त्र अंतर्गतहो रहा है; अतः उसके प्रति भी अपने बच्चोंको सजग करें । ध्यान रहे, ईश्वरने आपको माता-पिता, अभिभावक, पालक, शिक्षक बनाकर एक नूतन पीढीको संस्कारित करनेका उत्तरदायित्व दिया है, आप अपने इस धर्मका पालन जितनी सजगतासे करेंगें, आपपर ईश्वरकी कृपा उतनी ही अधिक प्रमाणमें होगी, साथ ही, आप एक उज्ज्वल भविष्यके निर्माणमें अपना योगदान देकर राष्ट्र और धर्म एवं संस्कृतिके प्रति अपने कर्तव्यका निर्वाह करेंगे, इससे आपके बच्चे आपके कुलका यश सर्वत्र प्रसारित करेंगे !



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