राम मन्दिर निर्माणके लिए भिखारियोंने एकत्रकर दिए २४२५ रुपये


०६ फरवरी, २०२१
समाचारके अनुसार, ये भिखारी झारखंडके रामगढ जनपद मुख्यालय स्थित कुष्ठरोगियोंके एक वसतिगृहमें रहते हैं । यहांकी एक निवासी सरस्वती देवीने बताया कि वे लोग प्रतिदिन भीख मांग और अवस्कर (कचरा) एकत्रकर जीवनयापन करते हैं; परन्तु बात जब राम मन्दिर निर्माणमें सहयोगकी आई तो वे लोग स्वयंको रोक नहीं पाए । यहींके निवासी जीतू महतोने भी भगवान रामके प्रति आस्था और श्रद्धा दिखाते हुए राम मन्दिरके लिए १ सहस्र रुपये अर्पण किए ।
इससे पहले ऐसा ही समाचार मध्यप्रदेशके बैतूल जनपदसे सामने आया था । वहां एक भीख मांगनेवाली वनवासी महिला देवकूबाईने, ‘भिक्षा’में मिली, वर्तमानमें प्रचलित मुद्राएं, जो १, २, ५ अथवा १० रुपयोंके रूपमें थीं, ऐसी १०० रुपयोंकी मुद्राएं, उन्होंने मन्दिर निर्माण अर्पण कर दी थीं ।
अयोध्यामें राम मन्दिर निर्माणके समाचारके पश्चात देशके कोने-कोनेसे प्रत्येक वर्गके लोग दान दे रहे हैं । ऐसेमें झारखंडसे कुछ ऐसे रामभक्त सामने आए हैं, जिनकी श्रद्धा उदाहरण बन गई है । ये कोई साधारण रामभक्त नहीं हैं । इनका जीवनयापन स्वयं भीख मांगकर चलता है; परन्तु इसके पश्चात भी इन्होंने श्रीरामके नाम २४२५ रुपये समर्पित किए हैं ।
       त्याग भारतीय संस्कृतिकी मूल भावना है, गुरुकुल शिक्षा पद्धतिमें धर्मके सभी आवश्यक तत्त्वोंका समावेश था; अत: प्रत्येक मनुष्यमें यह भावना होती थी । आजकी मैकालेद्वारा प्रचलित की गई शिक्षा पद्धति एवं धर्मनिरपेक्षता, एक ऐसे रोगके रूपमें सामने आई हैबऔर इसके प्रभावमें लोग अपनी संस्कृतिको ही भूलते जा रहे हैं; परन्तु चाहे भिखारियोंद्वारा दिया गया कुछ रुपयोंका दान हो या हिमालयमें रहनेवाले एक सन्तद्वारा दिया गया १ कोटि (करोड) रुपयोंका दान हो, यह प्रमाणित करता है कि भारतीयोंमें त्यागके संस्कार अभी भी हैं और ये भी हमारी संस्कृतिको महान बनाते हैं । – सम्पादक, वैदिक उपाासना पीठ 

स्रोत : ऑप इंडिया



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