भगवान शिवके १९ अवतार (भाग – २)


५. अश्वत्थामा
महाभारतके अनुसार, पाण्डवोंके गुरु द्रोणाचार्यके पुत्र अश्वत्थामा, काल, क्रोध, यम व भगवान शंकरके अंशावतार थे । आचार्य द्रोणने भगवान शंकरको पुत्र रूपमें पानेके लिए घोर तपस्या की थी; फलस्वरूप भगवान शिवने उन्हें वरदान दिया था कि वे उनके पुत्रके रूपमें अवतीर्ण होंगे । समय आनेपर सवन्तिक रुद्रने अपने अंशसे द्रोणके बलशाली पुत्र, अश्वत्थामाके रूपमें अवतार लिया । ऐसी मान्यता है कि अश्वत्थामा अमर हैं तथा वे आज भी धरतीपर ही निवास करते हैं । शिवमहापुराणके (शतरुद्रसंहिता-३७) अनुसार, अश्वत्थामा आज भी जीवित हैं तथा वे गंगाके किनारे निवास करते हैं; किन्तु उनका निवास कहां है ? यह नहीं बताया गया है ।

६. शरभावतार
भगवान शंकरका छठा अवतार है, शरभावतार । शरभावतारमें भगवान शंकरका स्वरूप आधा मृग (हिरण) तथा शेष शरभ पक्षीका था (पुराणोंमें वर्णित आठ पांवोंवाला जन्तु, जो सिंहसे भी अधिक शक्तिशाली था) । इस अवतारमें भगवान शंकरने नृसिंह भगवानकी क्रोधाग्निको शान्त किया था ।
लिंगपुराणमें शिवके शरभावतारकी कथा है, जिसके अनुसार, हिरण्यकशिपुका वध करनेके लिए भगवान विष्णुने नृसिंहावतार लिया था । हिरण्यकशिपुके वधके पश्चात भी जब भगवान नृसिंहका क्रोध शान्त नहीं हुआ, तब सभी देवता भगवान शिवके पास पहुंचे । तत्पश्चात भगवान शिवने शरभावतार लिया एवं इसी रूपमें वे भगवान नृसिंहके निकट पहुंचे, उनकी स्तुति की; किन्तु नृसिंह भगवानकी क्रोधाग्नि शान्त नहीं हुई । यह देखकर शरभरूपी भगवान शिव, अपनी पूंछमें नृसिंह भगवानको लपेटकर ले उडे । तब कहीं जाकर भगवान नृसिंहकी क्रोधाग्नि शान्त हुई । उन्होंने शरभावतारसे क्षमा याचनाकर अति विनम्र भावसे उनकी स्तुति की ।

७. गृहपति अवतार
भगवान शंकरका सातवां अवतार है, गृहपति । इसकी कथा इस प्रकार है :-
नर्मदाके तटपर धर्मपुर नामका एक नगर था । वहां विश्वानर नामके एक मुनि तथा उनकी पत्नी शुचिष्मति रहती थीं । शुचिष्मतिने बहुत कालतक निःसन्तान रहनेपर एक दिन अपने पतिसे शिवके समान पुत्र प्राप्तिकी इच्छा की । पत्नीकी अभिलाषा पूरी करनेके लिए मुनि विश्वानर काशी आ गए । यहां उन्होंने घोर तपद्वारा भगवान शिवके वीरेश लिङ्गकी आराधना की ।
एक दिन मुनिको वीरेश लिङ्गके मध्य एक बालक दिखाई दिया । मुनिने बालरूपधारी शिवकी पूजा की । उनकी पूजासे प्रसन्न होकर भगवान शंकरने शुचिष्मतिके गर्भसे अवतार लेनेका वरदान दिया । कालान्तरमें शुचिष्मति
गर्भवती हुईं एवं भगवान शंकर, शुचिष्मतीके गर्भसे पुत्ररूपमें प्रकट हुए । कहते हैं, पितामह ब्रह्माने ही उस बालकका नाम गृहपति रखा था ।

८. ऋषि दुर्वासा
भगवान शंकरके विभिन्न अवतारोंमें ऋषि दुर्वासाका अवतार भी प्रमुख है । धर्मग्रन्थोंके अनुसार, सती अनसूयाके पति, महर्षि अत्रिने ब्रह्माके निर्देशानुसार पत्नी सहित ऋक्षकुल पर्वतपर पुत्रकामनासे घोर तप किया । उनके तपसे प्रसन्न होकर ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश, तीनों उनके आश्रमपर आए । उन्होंने कहा, “हमारे अंशसे तुम्हारे तीन पुत्र होंगे, जो त्रिलोकमें विख्यात तथा माता-पिताका यश बढानेवाले होंगे । समय आनेपर ब्रह्माजीके अंशसे चन्द्रमा उत्पन्न हुए । विष्णुके अंशसे श्रेष्ठ संन्यास पद्धतिको प्रचलित करनेवाले दत्तात्रेय उत्पन्न हुए एवं रुद्रके अंशसे मुनिवर दुर्वासाने जन्म लिया ।

९. हनुमान
भगवान शिवका हनुमान अवतार सभी अवतारोंमें श्रेष्ठ माना गया है । इस अवतारमें भगवान शंकरने एक वानरका रूप धरा था । शिवमहापुराणके अनुसार, देवताओं एवं
दानवोंको अमृत बांटते हुए विष्णुजीके मोहिनी रूपको देखकर, लीलावश, भगवान शिवने कामातुर होकर अपना वीर्यपात कर दिया । सप्तऋषियोंने उस वीर्यको कुछ पत्तोंमें संग्रहित कर लिया । समय आनेपर सप्तऋषियोंने भगवान शिवके वीर्यको वानरराज केसरीकी पत्नी, अंजनीके कानके माध्यमसे गर्भमें स्थापित कर दिया, जिससे अत्यन्त तेजस्वी एवं प्रबल पराक्रमी, श्रीहनुमानजी उत्पन्न हुए ।



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