भगवान शिवके १९ अवतार (भाग – १)


शिव महापुराणमें भगवान शिवके अनेक अवतारोंका वर्णन मिलता है; किन्तु बहुत ही कम लोग इन अवतारोंके विषयमें जानते हैं । धर्म ग्रन्थोंके अनुसार, भगवान शिवके १९ अवतार हुए थे । आइए, जानें शिवके १९ अवतारोंके विषयमें ।

१. वीरभद्र अवतार
भगवान शिवका यह अवतार तब हुआ था, जब दक्षद्वारा आयोजित यज्ञमें माता सतीने अपनी देहका त्याग किया था । भगवान शिवको जब यह ज्ञात हुआ, तब उन्होंने क्रोधमें अपने सिरसे एक जटा उखाडी एवं उसे रोषपूर्वक पर्वतके ऊपर पटक दिया । उस जटाके पूर्वभागसे महाभयङ्कर वीरभद्र प्रकट हुए । शिवके इस अवतारने दक्षके यज्ञका विध्वंस कर दिया एवं दक्षका सिर काटकर उसे मृत्युदण्ड दिया ।

२. पिप्पलाद अवतार
मानव जीवनमें भगवान शिवके पिप्पलाद अवतारका बडा महत्त्व है । शनि पीडाका निवारण, पिप्पलादकी कृपासे ही सम्भव हो सका । कथा है कि पिप्पलादने देवताओंसे
पूछा, ”क्या कारण है कि मेरे पिता दधीचि जन्मसे पूर्व ही मुझे छोडकर चले गए ?” इसपर देवताओंने उत्तर दिया कि शनिग्रहकी दृष्टिके कारण ही ऐसा कुयोग बना था । पिप्पलाद, यह सुनकर बडे क्रोधित हुए । उन्होंने शनिको नक्षत्र मण्डलसे गिरनेका शाप दे दिया । शापके प्रभावसे शनि, उसी समय आकाशसे गिरने लगे । देवताओंकी प्रार्थनापर पिप्पलादने शनिको इस बातपर क्षमा किया कि शनि जन्मसे लेकर १६ वर्षकी आयुतक किसीको कष्ट नहीं देंगे । तभीसे पिप्पलादका स्मरण करने मात्रसे शनिकी पीडा दूर हो जाती है । शिव महापुराणके अनुसार, स्वयं ब्रह्माने ही शिवके इस अवतारका नामकरण किया था ।

३. नंदी अवतार
भगवान शंकर, सभी जीवोंका प्रतिनिधित्व करते हैं । भगवान शंकरका नंदीश्वर अवतार भी इसी तथ्यका अनुसरण करते हुए, सभी जीवोंसे प्रेमका सन्देश देता है । नंदी (बैल), कर्मका प्रतीक है, जिसका अर्थ है कि कर्म ही जीवनका मूल मन्त्र है । इस अवतारकी कथा इस प्रकार है – शिलाद मुनि ब्रह्मचारी थे । वंश समाप्त होता देख उनके पितरोंने शिलादसे सन्तान उत्पन्न करनेको कहा । शिलादने अयोनिज एवं मृत्युहीन सन्तानकी कामनासे भगवान शिवकी तपस्या की । तब भगवान शंकरने स्वयं शिलादके यहां पुत्र रूपमें जन्म लेनेका वरदान दिया । कुछ समय पश्चात, भूमि जोतते समय, शिलादको भूमिसे उत्पन्न एक बालक मिला । शिलादने उसका नाम नंदी रखा । भगवान शंकरने नंदीको अपना गणाध्यक्ष बनाया । इस प्रकार नंदी, नंदीश्वर हो गए । मरुतोंकी पुत्री, सुयशाके सङ्ग नंदीका विवाह हुआ ।

४. भैरव अवतार
शिव महापुराणमें भैरवको परमात्मा शंकरका पूर्ण रूप बताया गया है । एक बार भगवान शंकरकी मायासे प्रभावित होकर, ब्रह्मा व विष्णु स्वयंको श्रेष्ठ मानने लगे । तब वहां तेजपुञ्जके मध्य एक पुरुषाकृति दिखाई पडी । उन्हें देखकर ब्रह्माजीने कहा, “चंद्रशेखर, तुम मेरे पुत्र हो; अतः मेरी शरणमें आओ ।” ब्रह्माकी ऐसी बात सुनकर भगवान शंकरको क्रोध आ गया । उन्होंने उस पुरुषाकृतिसे कहा, “कालकी भांति शोभित होनेके कारण आप साक्षात कालराज हैं । भीषण होनेसे भैरव हैं ।” भगवान शंकरसे इन वरोंको प्राप्तकर कालभैरवने अपनी अङ्गुलीकी नखसे ब्रह्माके पांचवे सिरको काट दिया । ब्रह्माका पांचवा सिर काटनेके कारण भैरव ब्रह्महत्याके पापसे दोषी हो गए । काशीमें भैरवको ब्रह्महत्याके पापसे मुक्ति मिली । काशीवासियोंके लिए भैरवकी भक्ति अनिवार्य बताई गई है ।



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