चुनाव परिणाम विश्लेषण करते समय अनेक लोगोंने कहा कि नोटाके कारण भाजपा दो राज्योंमें (राजस्थान और मध्य प्रदेशमें) हार गई; इसमें यदि सत्यता है तो भाजपाको अन्तर्मुख होकर विचार करना होगा कि यदि जो लोग उनके पक्षमें मत देनेवाले थे, उन्होंने ‘नोटा’को क्यों दबाया ?
वस्तुत: यदि इस देशमें सभी हिन्दुत्वनिष्ठ, राष्ट्रनिष्ठ और बुद्धिजीवी होते तो आज भारतके राजनेताओंको २ % भी मत नहीं मिलता ! वस्तुत: ‘नोटा’ आजके राजनीतिक पक्षके नेताओंको अन्तर्मुख करने हेतु एक अच्छा माध्यम है; क्योंकि वे कमसे कम एक बार चिंतन तो करें कि इतने प्रत्याशीके होते हुए भी जनताने ‘नोटा’ क्यों दबाया ? क्या यह स्वयंमें सिद्ध नहीं करता कि आजके नेता, राज करनेकी पात्रता ही नहीं रखते हैं ! किन्तु आजके राजनेताओंकी प्रवृत्ति बहिर्मुखी है; इसलिए वे इसके लिए दूसरोंको ही दोष देंगे, स्वयंका एवं अपने पक्षकी नीतियोंका अवलोकन नहीं करेंगे !
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