कलियुगमें अन्य योगमार्गके योग्य गुरु मिलना कठिन है और भक्तियोगके गुरु मिलना सरल है; अतः कलियुगमें भक्तियोगका योगमार्ग अधिक योग्य है । कलियुगमें अधिकांश सन्तोंने भक्तिमार्गका ही प्रसार किया है ! कुछ सन्त यदि ध्यानयोग, ज्ञानयोग या क्रियायोगका प्रसार करते भी हैं तो भी वे उसमें भक्तियोगको सम्मिलित अवश्य करते हैं; जिससे उनकेद्वारा अनुयायियोंको बताए गए योगमार्गकी व्यापकता बढ सके एवं उनके अनुयायियोंकी शीघ्र आध्यात्मिक प्रगति हो ! जैसे एक बार मैं एक गुरुभक्तसे मिली, उन्होंने कहा, “हम देवी-देवताओंको मानकर भक्तिमार्गका अनुसरण नहीं करते हैं, हम ध्यान करते हैं !” उनका आध्यात्मिक स्तर ४० % था ! मैं जानना चाहती थी कि ४० % आध्यात्मिक स्तरवाले साधकको उसके गुरु ध्यानमार्गकी साधना कैसे करवाते हैं ? अतः मैंने उनसे पूछा कि आप ध्यानमें किसका ध्यान करते हैं ?, तो उन्होंने कहा, “हम प्रातः छह बजेसे सात बजेतक ध्यान करते हैं; क्योंकि हमारे गुरु भी उसी समय ध्यान करते हैं; इसलिए हम उनके स्वरुपका ध्यान करते हैं या उनके चरणोंका ध्यान करते हैं !’’ मैंने उनसे प्रेमसे कहा, “भैया, गुरुका ध्यान बिना गुरुसे प्रेमके हो सकता है क्या ?’’ वे बोले, “नहीं” ! मैंने कहा, “आपका मार्ग गुरुकृपायोग है, और इसमें ध्यान और भक्ति, इन दोनों योगमार्गोंका आपके गुरुने संगम किया है । ध्यान दो प्रकारके होते हैं, एकमें बाह्य अवलम्बनका आधार लिया जाता है और दूसरेमें आन्तरिक अवलम्बनका, और यदि उस आन्तरिक अवलम्बनमें अपने इष्ट या आराध्यका आधार हो तो वह भक्तियोग ही होता है !” वे नि:शब्द थे ! थोडे प्रमाणमें उन ध्यानमार्गीका अहं भी न्यून हुआ ! मात्र ६०% से अधिक स्तरपर ध्यान बिना अवलम्बनके सम्भव होता है, इसलिए उससे नीचेके आध्यात्मिक स्तरपर किसी न किसी प्रकारका आधार लेना ही पडता है ! मैंने उन सन्तको भी मन ही मन नमन किया, जो ध्यानका आधार लेकर अपने शिष्यमें भक्तिमार्गका बीजारोपण कर रहे थे !
वस्तुत: जब बच्चा ‘भात-दाल’ नहीं खाना चाहता है तो मां उसके कौरको किसी और नामसे खिला देती है, सद्गुरु भी ऐसे ही होते हैं, समाज कैसे साधना करे ?, इसपर उनका सतत शोध चलता रहता है और वे पुरातन मार्गको नूतन नाम देकर अपने शिष्यको साधना पथपर अग्रसर करते हैं, इसलिए सद्गुरु पूजनीय होते हैं !
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