भक्तियोग कलियुगकी अधिक योग्य एवं प्रचलित साधना क्यों ? (भाग-३)


कलियुगमें धर्मका ह्रास हो जानेके कारण साधकत्वमें कमी आ गई है, फलस्वरूप साधनाके लिए समय निकालना कठिन है, ऐसेमें उठते-बैठते ईश्वरका नामसंकीर्तन करना अधिक सरल साधना है । व्यक्तिपर कलिका प्रभाव जितना अधिक होता है, उसके पास ईश्वरके लिए समय निकालना उतना ही कठिन होता है ! यह बात हमारे मनीषियोंको पूर्व कालसे ही ज्ञात थी, अतः उन्होंने कलियुग हेतु भक्तियोगकी साधनाका प्रतिपादन किया था ।
  इसके विपरीत, जैसे-जैसे हमारे भीतर ईश्वर हेतु उत्कण्ठा बढती है, उनके लिए समय निकालना सम्भव हो जाता है, चाहे परिस्थितियां कितनी ही विपरीत क्यों न हो ! अतः ऐसा नहीं है कि किसीके पास साधना हेतु समय नहीं होता, कलियुगी जीवमें स्वार्थ प्रबल होनेके कारण साधनाका महत्त्व उसके लिए नहीं होता है ! भक्तियोगको छोडकर शेष सभी योगमार्गमें साधना हेतु विशेष समय देने पडते हैं, पुरुषार्थ करने पडते हैं । भक्ति कहीं भी, किसी भी परिस्थितिमें की जा सकती है ।



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