आजकी शिक्षण पद्धति दिशाहीन है ! वह कैसे ?, इसके कुछ कारण बताती हूं-
अगस्त २००२ में मैं वाराणसीमें धर्म प्रसारकी सेवा करती थी । एक दिवस, विद्यार्थियोंके लिए नगर स्तरीय एक प्रतिस्पर्धामें जो छात्र उत्तीर्ण हुए थे, उनका पुरस्कार वितरण समारोह था और इसी निमित्त एक सांस्कृतिक कार्यक्रम भी था; मुझे वहां छात्रोंको उद्बोधन देने हेतु आमंत्रित किया गया था । उस सभागृहमें सम्पूर्ण नगरके तेजस्वी छात्र, जिनकी आयु १४ से १८ वर्षकी थी, वे उपस्थित थे । जब उनसे पूछा गया कि वे भविष्यमें क्या बनना चाहते हैं ?, तो वहां उपस्थित सभी छात्रोंने बताया कि वे चिकित्सक, संगीतज्ञ, क्रिकेट खिलाडी, इत्यादि बनना चाहते हैं; मात्र एक छात्रने कहा, मैं एक अच्छा व्यक्ति बनना चाहता हूं ! इसीसे आप आजकी शिक्षा प्रणालीकी दिशा क्या है ?, यह समझ सकते हैं ! विद्याका मूल उद्देश्य मुक्ति प्रदान करना होता है, किन्तु आजकी निधर्मी शिक्षण प्रणालीमें यह शब्द तो लुप्त है ही, यहां तक कि हम अपने बच्चोंको क्या बनना चाहिए ?, यह संस्कार तक नहीं दे पाते हैं; इसलिए कोई प्राध्यापाक हो तो भी वह देशद्रोही कार्य करता है (जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय इसका सबसे अच्छा उदहारण है), पुलिस अधिकारी हो तो आत्महत्या करता है, पिछले कुछ माहमें ही तीन उच्च पदस्थ पुलिस अधिकारियोंने आत्महत्या मात्र अवसादमें आकर की है), नेता हो तो भ्रष्टाचार कर सीना तानकर चलता है या पकडे जानेपर रोगका बहाना बनाकर चिकित्सालयमें भर्ती हो जाता है, क्रिकेट खिलाडी हो तो पैसे लेकर ‘मैच फिक्सिंग’ करता है और चिकित्सक हो तो रोगियोंसे पैसे कैसे ऐंठें ?, इसका विचार करता है ! क्योंकि आजकी शिक्षण प्रणाली हमें एक कर्तव्यनिष्ठ एवं धर्मनिष्ठ व्यक्ति बननेकी शिक्षा देती ही नहीं है, मात्र क्या बन सकते हैं कि अधिक धन अर्जित कर सकें ?, यह सिखाती है; इसलिए धन अर्जित करने हेतु आजके अधिकांश शिक्षित वर्ग अपनी नैतिकताको ताकपर रख देते हैं !
लोग विद्या अर्जित कर, धन अर्जित करनेवाले विवेकशून्य बुद्धिजीवी नहीं, अपितु मनुष्य बनें, सुसंस्कृत बनें, इसलिए वैदिक गुरुकुलकी आज भारतमें अत्यधिक आवश्यकता है !
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