भारतमें पुनः वैदिक गुरुकुलकी आवश्यकता क्यों ? (भाग -१)


आजके छात्रोंमें दिव्य गुणोंका विकास हो इस हेतु माता-पिता या विद्यालय या शिक्षकगण विशेष प्रयत्न नहीं करते हैं । सभीका एक ही लक्ष्य होता है, पाठ्यक्रमोंके विषयको रटकर परीक्षामें अच्छे अंक लाना, बडे विद्यालय या महाविद्यालयमें प्रवेश पाना एवं अन्तत: मोटे वेतनवाले चाकरी (नौकरी) पाना और भोग-विलासयुक्त स्वकेन्द्रित जीवन व्यतीत करना !
आजके युवा वर्ग किन मुख्य दोषोंसे ग्रसित है, उसके कारण क्या हैं एवं उसके उपाय क्या हैं, यह लेख श्रृंखला इसी सन्दर्भमें है, मेरे लेखोंके पाठक वर्गमें  ४० % युवा वर्ग है । यह आंकडा ‘यू ट्यूब’ और ‘फेसबुक’से ज्ञात हुआ है ! इसलिए भी यह लेख श्रृंखला आरम्भ कर रही हूं !
आलस्य रुपी दुर्गुणसे ग्रसित है आजका अधिकांश युवा वर्ग :
आलस्य, इस दोषसे आज अधिकांश युवा वर्ग ग्रसित हैं जिस दिन विद्यालय या महाविद्यालय नहीं जाना हो तो उस दिवस दिनके दस बजे तक वे सोए रहते हैं ! यदि उठ गए तो या भ्रमणभाषपर या दूरदर्शन संचपर अपना समय व्यर्थ करते हैं, इसका मूल कारण क्या है, आपको ज्ञात है ? उसे मनुष्य जीवनका मूल उद्देश्य क्या है ?, यह बताया ही नहीं गया है ! इस अनमोल मनुष्य जीवनका सदुपयोग कैसे करना चाहिए ?, यह ज्ञात न होनेके कारण वह अपना समय क्रिकेट देखने या खेलनेमें, अन्तर्जालपर (इन्टरनेटपर) या  विडियो गेम्समें या संगीत सुननेमें या गप्पें हांकनेमें व्यर्थ करता है ! और यही क्रम जीवन पर्यन्त चलता रहता है ! इसलिए शिक्षा, धर्म अधिष्ठित होनी चाहिए जिससे उसे बाल्यकालमें ही यह समझमें आ सके यह अनमोल मनुष्य जीवन भोगके लिए नहीं अपितु योग अर्थात साधनाके लिए है ! वैदिक गुरुकुलमें यह तथ्य पाठ्यक्रमोंका अविभाज्य अंग होगा ! (क्रमश:)



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