भारतमें पुनः वैदिक गुरुकुलकी आवश्यकता क्यों ? (भाग -२)


हमारे हिन्दू धर्ममें विद्यार्थी जीवनमें ब्रह्मचर्यका इतना महत्त्व था कि चार आश्रम व्यवस्थाका (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यासका) धर्म सिद्धान्त प्रतिपादन करते समय विद्यार्थीकालके अवस्थाको ‘ब्रह्मचर्य अवस्था’का नाम दिया गया !  इससे ही इस अवस्थामें ब्रह्मचर्यपालनका कितना महत्त्व है यह ज्ञात होता है । किन्तु इस वैदिक परम्पराका सत्यानाश मैकालेकी असुरी शिक्षण प्रणालीमें हो गया ! नैतिक मूल्य, धर्म और साधना तो आजके पाठ्यक्रमोंमें सिखाएं नहीं जाते है, ऊपरसे आगमें घी डालने समान विद्यार्थियोंको लैंगिक शिक्षा दी जाती है ! इन्हीं सब कारणोंसे आजका विद्यार्थी विवाह पूर्व सहजतासे अपने कौमार्यकको भंग करनेका महापाप करता है ! ब्रह्मचर्यका पालन क्यों करना चाहिए ?, उससे क्या लाभ होता है, यह सिखाया नहीं जाता है; इसलिए आज ७० वर्षके अनेक वृद्ध तक वासनामें लिप्त दिखाई देते हैं; किन्तु उनका दोष नहीं है ! यदि विद्यार्थी कालमें ब्रह्मचर्य पालनका लाभ सिखाया जाता तो आज नारीको पूजनेवाला देश नित्य बलात्कार और सामूहिक बलात्कारके समाचारोंसे आहत नहीं होता !; इसलिए इस लेख श्रृंखला अन्तर्गत हम आपको ब्रह्मचर्यके महत्त्वके विषयमें भी जानकारी देंगे ! (क्रमश:)



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