प्रार्थना रट्टू तोते समान नहीं अपितु भावपूर्वक करें
अनेक बार हम प्रार्थना करते हैं; किन्तु यदि वह मात्र करनेके लिए की जाए, जैसे हम सब विद्यालयमें करते थे तो उसका कोई विशेष लाभ नहीं होता, मात्र उससे प्रार्थनाका एक संस्कार निर्माण होता है । प्रार्थनामें यदि आर्तता न हो तो वह प्रार्थना व्यर्थ हो जाती है । जैसे एक निर्धन व्यक्तिको पांचसौ रुपए चाहिए तो वह किस आर्ततासे मांगेगा ?, वैसी ही आर्तता, प्रार्थनाके समय होनी चाहिए । प्रार्थना करते समय लीनता, शरणागति एवं याचक भाव होना आवश्यक है । ये गुण जितने अधिक होंगेंं, हमारी प्रार्थना उतनी ही परिणामकारक होगी । प्रार्थना भक्तियोगका एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है । यदि इसे भावपूर्वक किया जाए तो इससे जीवके चित्तकी शुद्धि होती है । आत्मनिवेदनकी यह प्रक्रिया शीघ्र फल देकर साधककी श्रद्धामें वृद्धि करती है । (क्रमश:)
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