कुछ धर्मनिष्ठ वृद्ध हिन्दुत्ववादियोंको लगता है कि अब उनका शरीर दुर्बल हो गया है; अतः वे अब हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना निमित्त कुछ नहीं कर सकते हैं, वैसे ही कुछ स्त्रियोंको जिन्हें समष्टि कार्य करनेमें उनके परिवारके लोग विरोध करते हैं, उन्हें भी ऐसी ही निराशा होती है । ऐसे सभी व्यक्तियोंके लिए जो चाहकर भी हिन्दू राष्ट्र निमित्त तन, धन, बुद्धि या कौशल्यसे कुछ नहीं कर पा रहे हैं, वे सब हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना निमित्त सातत्य एवं भावसे प्रार्थना कर इस महती कार्यमें अपना योगदान दे सकते हैं । इस हेतु आपको जो भी समष्टि प्रार्थनाएं इस लेखमाला अंतर्गत बताई जा रही है, उसे एक कागदपर (कागज उर्दू शब्द है) लिखकर अपने कक्षके द्वारके पीछे लगा दें एवं सम्पूर्ण दिवस जब भी आपको ध्यान आए, उसे करनेका प्रयास करें । समष्टि कल्याणार्थ प्रार्थना करनेसे व्यापकता और भाव दोनोंमें वृद्धि होती है और हमपर ईश्वरीय कृपाका सम्पादन होता है । हिन्दू राष्ट्रकी स्थापनामें सर्वाधिक महत्त्व आध्यात्मिक स्तरके प्रयत्नोंका ही है, ऐसा हमारे श्रीगुरुने बताया है; अतः इसमें अपने सामर्थ्य अनुसार तन, मन, धन और कौशल्यके अतिरिक्त साधनाकर भी योगदान देनेका प्रयास करें । ये प्रार्थनाएं कालानुसार होनेसे हमारी आध्यात्मिक प्रगति हेतु भी पोषक है ।
आजकी प्रार्थना निम्नलिखित है –
“हे प्रभु, (अपने आराध्य/आराध्याका ध्यान कर, उनका नाम भी ले सकते हैं) हिन्दू राष्ट्र निमित्त कार्य करनेवाले सभी हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ताओं, साधू, संन्यासी, गृहस्थ एवं साधकोंको जो स्थूल एवं सूक्ष्म स्तरके अवरोध हो रहे हैं या आनेवाले हैं, उसे आप दूर करनेकी कृपा करें, ऐसी आपके श्रीचरणोंमें प्रार्थना है ।
आपके मनमें प्रश्न निर्माण हो रहा होगा कि क्या ऐसे प्रार्थनासे हमारी साधना व्यय तो नहीं होगी ? समष्टि हितार्थ की जानेवाली कालानुसार प्रार्थनाओंसे व्यष्टि साधना व्यय नहीं होती है, अपितु आध्यात्मिक प्रगति होती है । प्रार्थना जब हम भावनामें आकर किसी व्यक्ति विशेषके वैयक्तिक कष्ट दूर करने हेतु करते हैं और यदि हमारा आध्यात्मिक स्तर ६१ % से न्यून हो तो हमें कष्ट भी होता है और हमारी साधना भी व्यय होती है । कालानुसार हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना होना निश्चित है, इसे ब्रह्माण्डकी कोई शक्ति टाल नहीं सकती है; अतः एक कहावत है न, ‘बहती गंगामें हाथ धोना’, वैसे ही इस कालका लाभ अपनी साधना हेतु करें और समष्टि हितार्थ निश्चिन्त होकर प्रार्थना करें । आपमें समष्टि उद्धार हेतु जितनी अधिक उत्कंठा होगी, उतनी ही अधिक प्रमाणमें आपपर ईश्वरीय कृपा सम्पादित होगी, मात्र इस निमित्त व्यष्टि साधनाके आधारको ठोस बनाएं । प्रार्थना व्यष्टि साधनाको ठोस करनेका एक महत्त्वपूर्ण आधार है, यह भी आपको बता ही चुके हैं ।
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