प्रार्थना – भावजागृति एवं भाववृद्धिका एक महत्त्वपूर्ण घटक (भाग – १०)


पिछले अनेक शतकोंसे हिन्दू, बाह्य आक्रान्ताओंके हाथों परतन्त्र होते आए हैं, इसका मूल कारण रहा है, हिन्दुओंमें एकताका अभाव । अपनी क्षुद्र स्वार्थकी सिद्धि हेतु सभी हिन्दू राजाओंने एकजुट होकर विदेश आक्रान्ताओंका सामना नहीं किया और परिणामस्वरूप उन्हें विदेशी शासकोंकी अधीनता स्वीकार करनी पडी एवं कालान्तरमें ऐसे आक्रान्ताओंके शासनकालमें अमानवीय अत्याचार सभीको सहना पडा । आज तो हिन्दुओंकी स्थिति और भी विकट है । मुट्ठीभर हिन्दू साथ आकर एक साथ गणेश उत्सव, नवरात्रोत्सव नहीं मना पाते हैं और आप प्रत्येक गलीमें एक भिन्न गुटके लोगद्वारा धार्मिक  पण्डाल बना हुआ पाएंगे, जबकि ऐसे धार्मिक उत्सवोंका उद्देश्य आध्यात्मिक लाभके साथ ही हिन्दुओंमें संघ भावका निर्माण करना भी था । हिन्दुत्वनिष्ठ संगठनोंकी या राजनितिक दलोंकी या भिन्न आध्यात्मिक सम्प्रदायोंकी भी स्थितियां ऐसी ही हैं ।
भगवान श्रीकृष्णने कहा है, ‘संघे शक्ति कलौ युगे’ अर्थात कलियुगमें संगठित रहनेमें हमारा कल्याण निहित है; अतः हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना हेतु सभी हिन्दुओंको अपने सर्व वैचारिक भेदभाव त्यागकर संगठित होकर इस दिशामें कार्य करना आवश्यक है । यह कालकी मांग है ।
हिन्दुओंमें संघ भाव निर्माण हो, इस हेतु हिन्दुराष्ट्र प्रेमियोंने प्रत्येक दिवस कमसे कम इक्कीस बार इसप्रकार प्रार्थना करनी चाहिए –
“हे प्रभु, हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना निमित्त सभी हिन्दुराष्ट्र प्रेमियोंमें संघ भाव निर्माण होने दें, हम सभी एक महती उद्देश्यकी प्राप्ति हेतु अपने सभी भेदभाव भुलाकर राष्ट्र एवं धर्मके पुनरुत्थान हेतु एकत्रित आकर कार्य कर सकें, ऐसी आप कृपा करें ।”



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