प्रार्थना – भावजागृति एवं भाववृद्धिका एक महत्त्वपूर्ण घटक (भाग- ९)
आजसे दो शतक पूर्वतक ९० % हिन्दू यद्यपि योग्य साधना नहीं करते थे, तथापि धर्माचरणका पालन करनेका प्रयास तो अवश्य ही करते थे; किन्तु मात्र दो शतकोंमें अंग्रेजोंकी नास्तिक विचारधारा एवं बाह्य आडम्बरोंने साधना विरहित हिन्दुओंको उनकी तमोगुणी संस्कृतिकी ओर आकृष्ट किया और आज स्थिति यह है कि पाश्चात्योंका अनुकरण सुदूर ग्रामीण क्षेत्रोंमें रहनेवाले हिन्दू भी करने लगे हैं । इससे भी सर्वत्र धर्मभ्रष्टता फैल रही है । हिन्दू राष्ट्रकी स्थापना हेतु धर्मग्लानिको रोकना होगा एवं हिन्दुओंको धर्माचरणी बनाते हुए उन्हें योग्य साधनाकी शिक्षा देकर, साधना करने हेतु प्रवृत्त करना होगा; क्योंकि साधकत्वहीन हिन्दू, आगामी रामराज्य रूपी हिन्दू राष्ट्रमें रहनेकी पात्रता नहीं रखते; अतः सभी कर्मनिष्ठ हिन्दूराष्ट्रप्रेमी स्वयं धर्माचरण व साधना करें तथा अन्योंको करने हेतु उद्युक्त करें, यह कालकी आवश्यकता है । इस निमित्त प्रतिदिन आर्ततासे अपने आराध्य देवता या गुरुसे इसप्रकार प्रार्थना करें –
”हे प्रभु, अधिकसे अधिक जन्म हिन्दू कर्म हिन्दू बन सकें, वे साधना एवं धर्माचरण कर सकें, ऐसी उन्हें सद्बुद्धि प्रदान करें, आगामी हिन्दू राष्ट्र हेतु समाजमें साधकत्व निर्माण होने दें । इस निमित्त हमसे यथासम्भव समष्टि प्रयत्न करवाकर ले लें, ऐसी आपके श्रीचरणोंमें प्रार्थना है ।”
यह प्रार्थना करनेवाले कर्म हिन्दुओंने ‘सभी जन्म हिन्दू’ यह शब्द प्रयोग इसलिए नहीं करना है; क्योंकि अनेक पतित, व्यभिचारी, भ्रष्टाचारी, समाजद्रोही, राष्ट्रद्रोही एवं धर्मद्रोही हिन्दुओंके पाप इतने बढ चुके हैं कि वे अब धर्मपथपर अग्रसर नहीं हो सकते हैं ! ईश्वरीय विधान अनुसार, वे हिन्दू राष्ट्रसे पूर्वके आपातकालमें कालके ग्रास बनेंगे; अतः प्रार्थना करते समय ऐसी प्रार्थना, जो सम्भव ही नहीं है, वह नहीं करनी चाहिए ।
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