भीषण आपातकालको मिल-जुलकर धैर्यसे भोगना होगा !


सन्त कहते थे कि आनेवाला काल बहुत ही भीषण होगा । लीजिये ऐसा काल आ गया कि आप लोगोंसे मिल-जुल भी नहीं सकते हैं । घरका कोई सदस्य यदि ‘कोरोना’ महामारीसे पीडित हो जाए तो उसे स्पर्श कर सांत्वना भी नहीं दे सकते, उसका सिर अपनी गोदमें रखकर उसे चिकित्सकीय वाहनमें (एम्बुलेंसमें) चिकित्सालयतक ले नहीं जा सकते हैं । चिकित्सालयमें पीडित परिजनको देखनेके लिए नहीं जा सकते, उसकी देखभाल नहीं कर सकते; यहांतक कि मरनेके पश्चात उसके सगे-सम्बन्धी, मित्र-परिजन मिल-जुलकर अपना कन्धातक नहीं दे सकते, शास्त्र अनुसार उसका अन्त्येष्टि कर्म भी नहीं कर सकते और कैसा आपातकाल चाहिए ? इसलिए इस आपातकालमें संयमसे रहना सीखें ! यह सब हम सबकेद्वारा किए गए पापकर्मका परिणाम है, जिसे समष्टि पाप कहते हैं; अब इसे मिल-जुलकर धैर्यसे भोगना तो होगा ही; इसलिए इस आपातकालमें अपने विवेकका उपयोगकर इस महामारीसे बचने हेतु जो कहा था उसका पालन करें ! हमें ज्ञात है, किसीकी बात माननेकी वृत्ति न होनेके कारण, आज शासन और प्रशासनद्वारा दिए गए निर्देशोंका पालन करना सबके लिए कठिन है; किन्तु कहीं न कहीं प्रकृति भी हमारे मनमाने आचरणसे रुष्ट है और हम उसके कोपका पात्र न बनें, इस हेतु उसके कोपको रोकने हेतु वह हमें अपने निर्देशोंका पालन करने हेतु बाध्य कर रही है । चलिए, इससे एक बात तो अच्छी हो जाएगी कि आजके मनमाने आचरणसे जीवन व्यतीत करनेवालोंको कुछ कालके लिए, महामारीके प्रकोपसे बचने हेतु या चाहे दण्डके भयसे ही सही; किन्तु आज्ञापालन करनेकी सीख तो मिलेगी ।


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