‘उपासना’के आश्रममें भारतके साथ विश्वके कई देशोंसे जिज्ञासु एवं साधक आते रहते हैं, उसी क्रममें मैंने पाया कि अधिकांश आगन्तुकोंके भोजन ग्रहण करने सम्बन्धी संस्कार अति तीव्र होते हैं एवं भोजनके प्रति आध्यात्मिक दृष्टिकोणका पूर्ण रूपेण अभाव होता है; अतः आज भोजनसे सम्बन्धित कुछ योग्य दृष्टिकोण जो साधना हेतु पोषक हैं, उसे आपसे साझा कर रही हूं, इन तथ्योंको ध्यान रख, भोजन ग्रहण करनेसे साधना भी होगी एवं अध्यात्मको आप प्रतिदिन आचरणमें ला सकेंगे ।
१. हमारी दैवी, वैदिक संस्कृतिमें हम भोजन नहीं, अपितु देवताको अर्पित महाप्रसाद ग्रहण करते हैं; अतः आप जब भी घरमें आश्रममें, होटलमें या बाहर, कहीं भी भोजन लें, तो वह महाप्रसाद ही है, इस भावसे उसे प्रेम एवं कृतज्ञताके भावसे ग्रहण करें, जो व्यक्ति ऐसा करता है, उसे आपातकालमें भी ईश्वर सदैव उसके शरीरके पोषण हेतु आहार अवश्य देते हैं ।
२. भोजन चाहे कहीं भी ग्रहण करें, उससे पूर्व प्रार्थना करें । आजके अन्न, फल, तरकारी सब दूषित होते हैं; क्योंकि उन्हें उपजानेसे लेकर बनाने तक अधिकांश लोग उनके ऊपर कोई वैदिक संस्कार नहीं करते एवं रासायनिक खाद तथा कीटनाशक औषधियां उसे और विषैला बना देते हैं; अतः भोजन करनेसे पूर्व आर्ततासे ईश्वरसे प्रार्थना करनेसे उसके तमोगुण एवं विषैले तत्त्वका नाश होता है तथा वह भोजन चैतन्यसे (ईश्वरीय शक्तिसे) भारित होकर महाप्रसाद बन जाता है, जिससे उसे ग्रहण करनेसे शारीरिक और मानसिक व्याधिका प्रमाण नगण्य हो जाता है ।
३. आपकी थालीमें जो प्रसाद दिया जाए, उसके एक दानेको भी कभी झूठनके रूपमें न छोडें; क्योंकि महाप्रसादको झूठनके रूपमें छोडना पाप है, इससे अन्नका अपमान होता है, जो एक प्रकारसे अन्नपूर्णा मांका अपमान होता है; इसलिए थालीमें आए महाप्रसाद यदि अधिक हो तो उसे ग्रहण करनेसे पूर्व ही निकाल दें या आग्रह कर निकलवा दें । साथ ही जिस थालीमें आप भोजन ग्रहण करते हैं, उसमें भूलसे भी हाथ न धोएं; क्योंकि भोजन ग्रहण करनेसे पूर्व आपने उसमें देवताका आवाहन किया होता है ।
४. महाप्रसाद यथासम्भव नीचे भूमिपर आसन लेकर बैठकर ग्रहण करें, इससे शारीरिक और आध्यात्मिक दोनों ही लाभ प्राप्त होते हैं और आहार शीघ्रसे पचता है ।
५. यदि आपको कोई पथ्य हो और वह व्यंजन आपको प्रिय हो तो उसे ग्रहण न करें; क्योंकि स्वस्थ शरीर, व्यष्टि एवं समष्टि दोनों ही साधना हेतु अति आवश्यक है; अतः आपका शरीर साधनाका एक माध्यम है, इस दृष्टिसे उसके प्रति सतर्क रहें और अपनी जिह्वापर नियन्त्रण करना सीखें ।
६. जो व्यंजन आपको प्रिय हो उसे भी आवश्यकतासे अधिक ग्रहण न करें एवं जो व्यंजन आपको प्रिय न हो उसे भी प्रेमसे ग्रहण करना सीखें, इससे आपके भोजनसे सम्बन्धित मनमें रुचि-अरुचिके संस्कार-केन्द्र धूमिल होते जाएंगे, जो साधना हेतु पोषक होगा । अर्थात् भोजन ग्रहण करना, यह एक यज्ञकर्म तभी बनेगा, जब आप उपर्युक्त सर्व तथ्योंका पालन करेंगे एवं तभी आप भोजन नहीं अपितु महाप्रसाद ग्रहण कर रहे होंगे ।
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