जनवरी २, २०१९
रामजन्मभूमि प्रकरणमें ‘रिपब्लिक टीवी’द्वारा किए गए ‘स्टिंग ऑपरेशन’में यह बात सामने आई है कि ख्रिस्राब्द १९९० में तत्कालीन समाजवादी पार्टीके शासनके आदेशपर पुलिसने चुन चुनकर कारसेवकोंको गोली मारी थी । इतना ही नहीं, मृत कारसेवकोंका अन्तिम संस्कार सनातन संस्कृतिके उचित नियमानुसार न करके दफना दिया गया !!
‘रिपब्लिक टीवी’के पत्रकार पीयूष मिश्राने जब रामजन्मभूमि थानाके तत्कालीन उपनिरिक्षक वीर बहादुर सिंहसे इस बारेमें बात की, तो उन्होंने स्वीकार किया कि उस समय जो हुआ, वो हिन्दुओंका नरसंहार था । उन्होंने कहा कि राज्य शासनने मृत हिन्दुओंका अंतिम संस्कारके लिए धन नहीं दिया था !! पत्रकारने पूछा कि क्या केवल १६ लोग ही मारे गए थे, जैसा कि शासन कहता था ? वीबी सिंहने कहा, “देखिए उस समय जब विदेशी पत्रकार आए, तो जिलाधिकारी और पुलिस वरिष्ठ अधीक्षकने (एसएसपीने) कहा कि जाइए एसओसे बात करिए ! उन पत्रकारोंके कैमरेमें बताया कि केवल ८ लोग पुलिसकी गोलीसे मारे गये हैं, जबकि ४२ चोटिल हैं, जोकि उचित नहीं है । इसके पश्चात जब मैं श्मशान घाट गया और वहां लोगोंसे पूछा कि कितने मृतक जलाए और कितने दफनाए जाते हैं ? तो उनका उत्तर था कि १५-२० मृतक दफनाएं जाती हैं, शेष जलाएं जाते हैं । तो हमने इस आधारपर शासनसे कहा कि कम लोग ही मरे हैं; परन्तु वास्तवमें जो मृतक दफनाएं जाते थे, वे सभी कारसेवक ही थें !!”
आगे पत्रकारने पूछा कि इस घटनाके पश्चात बहुत लोग अपनोंको ढूंढते आए होंगे, तो उन्हें क्या बताया गया ? इसपर सिंहने कहा, “वो आते रहे तो उसको दिखाया गया कि ये मृतक शरीर उनके नहीं हैं, ये दफनाए हुए मृतक हैं ।”
उल्लेखनीय है कि ३० अक्टूबर और २ नवम्बर १९९० को हुई वीभत्स घटनामें शासकीय विवरणके अनुसार १६ निहत्थे कारसेवकोंके प्राण चले गए थें । मुलायम सिंहने यह बात स्वीकार की थी कि उन्होंने ही कारसेवकोंपर गोलियां चलवाईं थीं, जिनमे १६ कारसेवकोंकी मृत्यु हुई; परन्तु ‘रिपब्लिक टीवी’का यह ‘स्टिंग ऑपरेशन’ यह सिद्ध करता है कि शासकीय अंक-विवरण भ्रामक था । यह सत्य जानबूझकर दबाया गया !!
२०१६ में मुलायम सिंहने कहा था, “मुझे अयोध्यामें कारसेवकोंपर गोली चलानेके आदेश देनेका दुःख नहीं है । कारसेवकोंपर गोलीबारीका आदेश देनेका मेरा निर्णय मुस्लिमोंको बचानेके लिए था । इस देशमें मुसलमानोंके विश्वासको बनाए रखनेके लिए इस निर्णयकी आवश्यकता थी ।” जबकि सत्य यह है कि रामजन्मभूमि आंदोलनमें अयोध्याकी किसी भी मस्जिदको रामभक्तोंने हानि नहीं पहुंचाई थी ।
“इतना वृहद नरसंहार करके असुरकी पदवी रखनेवाला मुख्यमन्त्री आजतक खुला घूम रहा है और न्यायालय कहता है कि प्रकरण प्रविष्ट करनेमें देरी हुई तो अभियोग स्वीकार नहीं करेंगें, मौनव्रतधारी हिन्दुओ ! आत्मा मृत है या जीवित, स्वयंसे पूछे ! शासन परिवर्तन होनेके पश्चात भी कारसेवकोंके परिजनोंकी सहायता व न्याय हेतु कौन हिन्दुवादी नेता आगे आया ? क्या कोई न्यायके लिए लडा ? किसी नेता या न्यायादाताओंका पुत्र जाता, क्या तब भी ऐसी स्थिति होती ? सम्भवतः नहीं ! और स्वयंको देशका चौथा स्तम्भ बतानेवाला समाचार जगत इसके पश्चात भी स्वयंको निष्पक्ष और धर्मनिरपेक्ष बताता है, इससे अधिक हास्यस्पद और क्या होगा ? अब हिन्दुओंको न्याय व रक्षाके लिए केवल हिन्दू राष्ट्रकी ही आवश्यकता है !”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ
स्रोत : ईपोस्टमोर्टम
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