अनेक हिन्दुत्ववादी भावनामें बहकर हमारे धर्मकार्यमें अपना कौशल्य अर्पण करना आरम्भ कर देते हैं; परंतु व्यष्टि साधनाके ठोस आधारके अभावमें उन्हें हमारे कार्यमें सहयोग देते समय इतनी अडचनें आती हैं कि वे उस सेवाको मध्यमें ही छोड देते हैं । जबकि मैं पहले ही उन्हें सतर्क कर देती हूं कि वर्तमान कालमें धर्मकार्यमें यथा शक्ति योगदान देना, शिव धनुष उठाने समान है; परन्तु अहंकारवश उन्हें मेरे इस तथ्यपर अंशमात्र भी विश्वास नहीं होता और परिणामस्वरूप वे यहां-वहांसे तथ्योंको लेकर सबमें ज्ञान बांटते रहते हैं या किसी हिंदुतत्ववादी संगठन, जिसका अध्यात्मसे कोई लेना देना नहीं है, उसमें कार्य कर लेते हैं, परंतु खरे अर्थोंमें जिसे धर्मकी या संतकी सेवा कहते हैं, उनमें अडचनें आनेपर तुरन्त ही सेवा छोड देते हैं, इससे ज्ञात होता है कि सर्व सामान्य हिन्दूकी व्यष्टि साधना (स्वयं की साधना और भक्ति) एवं क्षात्रवृत्ति कितनी अल्प हो गयी है ! – तनुजा ठाकुर
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