केरलके महाविद्यालयमें छात्राओंके बुर्का पहनकर आनेपर लगा प्रतिबन्ध !!


मई २, २०१९

श्रीलंकामें बुर्केपर प्रतिबन्ध लगनेके पश्चात भारतमें भी इसपर चल रही तीव्र बहसके मध्य केरलके एक महाविद्यालयने आदेश जारी करके कहा है कि छात्राएं बुर्का पहनकर न आएं ! केरलके मल्लपुरममें चलाए जा रहे इस अल्पसंख्यक महाविद्यालयमें बुर्का पहननेपर प्रतिबन्ध लगाया गया है । यह महाविद्यालय ‘मुस्लिम एजुकेशन सोसायटी’की ओरसे संचालित किया जाता है । लोकसभा मतदानके मध्य इस प्रतिबन्धपर राजनीतिक उठापटक भी निर्धारित मानी जा रही है । केरलके कुछ स्थानीय संगठनोंने इस निर्णयकी आलोचना भी की है ।

उल्लेखनीय है कि श्रीलंकामें भीषण आतंकी आक्रमणके पश्चात वहांके शासनने सार्वजनिक स्थानोंपर मुख ढकनेवाले प्रत्येक प्रकारके वस्त्रोंपर प्रतिबन्ध लगा दिया है । मतदानके कारण अब यह प्रकरण भारतमें भी उठने लगा है । शिवसेनाने अपने मुखपत्र ‘सामना’में सम्पादकीय लिखकर प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदीसे भारतमें भी बुर्कापर प्रतिबन्ध लगानेकी मांग की । यद्यपि बादमें पार्टीने स्पष्टीकरण दिया कि यह समाचारके सम्पादकका निजी परामर्श है ।

उधर, भोपालसे बीजेपी प्रत्याशी साध्वी प्रज्ञाने भी शिवसेनाकी इस मांगका समर्थन किया है । यद्यपि, बीजेपीने इस मांगको अस्वीकार कर दिया है । उधर, बीजेपी प्रवक्ता जीवीएल नरसिम्हा रावने ‘सामना’की सम्पादकीयपर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इसप्रकारके प्रतिबन्धकी कोई आवश्यकता नहीं है । भाजपाके अतिरिक्त ‘एनडीए’के ही एक अन्य सहयोगी रामदास आठवलेने शिवसेनाकी मांगको अस्वीकार किया है ।

‘मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन’के (एआइएमआइएम) अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसीने शिवसेनापर कटाक्ष किया है । उन्होंने कहा है कि यह हमारे संविधानमें मूलभूत अधिकार है । शेष आप यह हिन्दुत्व सबपर नहीं लागू कर सकते हैं । कलको बोलेंगे कि आपके मुखपर दाढी ठीक नहीं है, टोपी मत पहनिए । ओवैसीने कहा, “पढते नहीं हैं न ये (शिवसेना) लोग, उनको ३७७ उच्चतम न्यायालयने निकाल दिया, वह पढना चाहिए । यदि वह समझमें आ गया तो उनको ज्ञात हो गया, बडे अक्षरोंमें कह रहा हूं कि ‘CHOICE’ (चुनाव) यह हमारे संविधानमें मूलभूत अधिकार है ।”

 

“केरलका मुस्लिम महाविद्यालय यदि यह पग उठा सकता है तो अन्य क्यों नहीं ? जबकि ऐसा भी नहीं है कि इस्लाम दोनोंको भिन्न-भिन्न आदेश देता है । यह तो बुद्धिकी बात है कि एक परम्पराके कारण यदि देशपर संकट आ रहा है तो उस परम्पराको समाप्त करना ही उत्तम है; परन्तु संकीर्ण मानसिकता और राजनीतिक स्वार्थके चलते लोगोंको यह समझ नहीं आता है; परन्तु किसीको समझ आए या न आए राष्ट्रहितमें कठोर निर्णय लेने ही पडते हैं ।”- सम्पादक, वैदिक उपासना पीठ



स्रोत : नभाटा



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